आश्रम में होली – उन्मादी मगर हर तरह से सुरक्षित मौज-मस्ती – 8 मार्च 2015

मेरा जीवन

होली-समारोह का समापन हो गया है! हमने रंगों के इस त्योहार पर एक बार फिर एक खास, शानदार और अविश्वासनीय रूप से बेहद रंगीन समारोह का आयोजन किया था!

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि इस पूरे समय अपरा पर होली का बुखार चढ़ा हुआ था। वह रोज़ होली खेलती और सबसे कहती कि मुझे रंग चाहिए और हमारे कर्मचारियों को भी अपने साथ मिला लेती और उनके साथ बाज़ार जाकर खुद रंग खरीद लाती! उस पर जैसे होली के उन्माद का विस्फोट हुआ था!

होली के अंतिम दिन यानी 6 मार्च को हमारे यहाँ सबसे बड़ा समारोह आयोजित किया गया था, जिसमें न सिर्फ गुलाल से बल्कि रंगीन पानी से होली खेली गई और कई रंगों के रंगीन पानी की पिचकारियों से आपस में रंगों की बौछार की गई! यशेंदु और आश्रम के कर्मचारियों ने पिछली रात फूलों को उबालकर रंगीन पानी तैयार किया था और इसलिए पानी भी पर्याप्त गरम था। लेकिन अपरा का निर्णय था कि वह सूखे रंगों से ही होली खेलेगी और वह ज़रा अलग हटकर, गीला होने से बचते हुए होली खेलती रही!

लेकिन हमारे मेहमान बेहिचक हमारे साथ रंग खेलने बाहर निकल आए! हमारी तरह उन्होंने भी होली खेलने का भरपूर मज़ा लिया और पिछले साल की तरह उनके शरीर, सारे अंग-प्रत्यंगों सहित, रंगों में पूरी तरह सराबोर होते रहे। मुख्य समारोह के समापन तक हम सब थककर चूर हो चुके थे-फिर भी कल हर व्यक्ति बाहर निकल आया था और अलसाया सा त्यौहार के माहौल का और स्वाभाविक ही, स्वादिष्ट मिठाइयों और नमकीन नाश्तों का लुत्फ़ उठा रहा था!

कल एक जर्मन महिला आश्रम आई थी और अगले महीनों के विश्रांति सत्रों के बारे में पूछ रही थी। होली के दर्मियान वह वृन्दावन में ही थी-लेकिन होली का सबसे मुख्य दिन यानी छह मार्च उसने होटल के कमरे में बंद रहकर गुज़ारा क्योंकि उसके एक दिन पहले यानी पाँच मार्च को उसके साथ एक अप्रिय घटना हो गई। दरअसल, उस दिन वह होटल से बाहर निकली थी और बाहर भीड़ ने न सिर्फ उसे अच्छी तरह रंग दिया बल्कि मौके का फायदा उठाकर उसके शरीर के साथ छेड़खानी की और उसके साथ कई तरह से अभद्र व्यवहार भी किया। ऐसी भीड़भाड़ में, जब लोग होली के हुड़दंग में उन्मत्त हो चुके हों, ऐसी बातें होती ही रहती हैं-और महिलाएँ, कमरे में बंद रहने के अतिरिक्त, इस मामले में विशेष कुछ नहीं कर सकती। यह बड़े दुर्भाग्य और शर्म की बात है!

इसी कारण ट्रेवल एजेंसियों और ऑनलाइन ट्रेवल फोरम्स ने महिलाओं को आगाह करना शुरू कर दिया है कि मुख्य होली के दिन वे बाहर न निकलें अंदर ही रहें या फिर अपने जान-पहचान वाले समूह के साथ, गेस्ट हॉउस में ठहरे परिवारों के साथ या अन्य आपसी लोगों के साथ ही होली खेलें, सड़क पर निकलकर बाहर नहीं।

हमें ख़ुशी और सन्तोष है कि हमारे आश्रम में हम विदेश से आने वाले मेहमानों को सुरक्षित वातावरण में होली के संपूर्ण हुड़दंग का मज़ा लेने का मौका प्रदान करते हैं और वह भी यहाँ, वृन्दावन जैसी होली के लिए मशहूर जगह में। जी हाँ, हम सब पागलों की तरह होली खेलते हैं, सब एक-दूसरे की ओर दौड़ते-भागते फिरते हैं, बच्चे बनकर एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं-मगर हम कितना भी बहक जाएँ, हम जानते हैं कि किस तरह हर हाल में सामने वाले का सम्मान अक्षुण रखा जाना चाहिए। हमारे साथ हमारे कर्मचारी, हमारे मित्र गण, हमारे मेहमान, हमारे बच्चे और हमारे परिवार होते हैं। यह काफी बड़ी भीड़ होती है लेकिन किसी की गरदन पर भी रंग मलना है तो हम सब इतना भर जानते हैं कि हर हाल में सिर्फ और सिर्फ होली का आनंद लेना है, इसके इतर कुछ भी नहीं!

और इस समारोह में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों के लिए वह सिर्फ मौज-मस्ती और आमोद-प्रमोद ही बना रहता है! और अब, होली-समारोह की समाप्ति के बाद हमारे मन में उस सुखद समय की यादें हैं कि कैसे हम एक बार फिर बच्चे बन गए थे और रंगों की परवाह किए बगैर होली खेलते रहे! साल का यह सबसे बढ़िया समय होता है-और हम इस समय को दुनिया भर के अपने मित्रों के साथ गुज़ारकर और इस अनुभव में सबको सहभागी बनाते हुए, उसे सबके साथ साझा करते हुए बहुत खुश होते हैं!

अगले साल भी इसी तरह की शानदार होली खेलने का इंतज़ार हम अभी से करने लगे हैं!

इस वर्ष के होली समारोह के चित्र यहाँ देख सकते हैं

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