योग-विद्यार्थियों के साथ 2007 की होली – 4 जनवरी 2015

मेरा जीवन

सन 2007 के अपने आस्ट्रेलिया दौरे के बाद ऐन होली के समय मैं वृन्दावन लौट आया। होली रंगों का त्योहार है और इस बार वह कुछ ज़्यादा ही विशाल और रंगीन होने जा रहा था: कोलोन विश्वविद्यालय के सहयोग से हमारे द्वारा आयोजित IYTT यानी द इंटरनेशनल योग शिक्षक प्रशिक्षण के विद्यार्थी हमारे यहाँ आ रहे थे!

वे और कुछ दूसरे मित्र आए और हमारे यहाँ, आश्रम में कुल 20 लोग हो गए थे। स्वाभाविक ही विद्यार्थियों को योग कक्षाओं में और संबन्धित व्याख्यानों में भी उपस्थित रहना होता था इसलिए हम सब बहुत व्यस्त रहते थे। उनमें से कई पहली बार भारत आए थे इसलिए उनके आने के दूसरे दिन ही एक मज़ेदार घटना घटित हुई, जिसका ज़िक्र मैं आज करने जा रहा हूँ:

एक युवा महिला, शायद 25 साल की, सीढ़ियाँ उतरकर भागती हुई आई। वह बहुत उत्तेजित दिखाई दे रही थी। उसने हमें देखा और गहरी साँस लेते हुए तेज़ी के साथ हमें बताने लगी: "वहाँ, मेरे कमरे में एक छोटा सा मगरमच्छ घुस गया है!" क्या? मगरमच्छ? हम अपने कानों पर विश्वास नहीं कर सके और अपनी आँखों से कमरे में घुस आए उस सरीसृप को देखने तेज़ गति से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आए। वह वास्तव में एक सरीसृप ही था और काफी छोटा था। लेकिन वह मगरमच्छ जैसा डरावना या खतरनाक कतई नहीं था! वह महज एक छिपकली थी!

हम हँसे बगैर नहीं रह सके और फिर हमने उसे बताया कि यहाँ छिपकलियों का आना-जाना बहुत आम बात है-और वे मच्छर खाती हैं इसलिए वे हमारे लिए उपयोगी ही हैं!

कक्षाओं के दिन बीत गए-लेकिन होली समारोह वाले दिन कोई काम या व्याख्यान आदि नहीं हुए, सिर्फ मौज-मस्ती होती रही!

आप कल्पना कर सकते हैं कि वह समारोह कितना बड़ा रहा होगा। आश्रम के बगीचे में 20 लोगों की दौड़-भाग और धींगा-मस्ती, एक-दूसरे पर रंगों की बौछार और रंग-गुलाल फेंकना-उछालना!

उस बड़े और मदहोश समारोह के पश्चात हमने एक खेल शुरू किया: बगीचे की घास पर सभी एक के बाद एक लेट गए और पहला व्यक्ति दूसरे सभी लोगों पर लुढ़कने लगा और फिर उसके बाद वाला और फिर उसके बाद वाला। और जब वे इस तरह लुढ़कते, हम उन पर और रंग डालते और उन्हें रंगों से शराबोर कर देते! रंगों से पूरी तरह लिथड़कर वे सभी बड़ी देर तक उत्फुल्लता के साथ हँसते और उल्लसित होकर होहल्ला मचाते रहे!

जैसे रंग यहाँ मिलते हैं, होली खेलने के बाद उन्हें उतारना बड़ा मुश्किल होता है! हम हर साल होली का मज़ा लेते हैं लेकिन नहाने के बाद भी कई दिनों तक शरीर से हरा, नीला और गुलाबी रंग हटता नहीं है। और एक पुरुष और एक महिला, जो पहले ब्लोण्ड थे, अब उनके बालों के रंग अचानक गुलाबी हो गए थे!

और महिला ने तो बालों को गुलाबी ही रहने दिया मगर पुरुष ने बाल कटवा लिए। महिला का कहना था कि गुलाबी रंग उसे पसंद है और वह किसी काम में व्यवधान भी उपस्थित नहीं करता! शायद यह लिंग भेद के नतीजा हो-पुरुष गुलाबी रंग को शायद महिलाओं का रंग मानते हों! 🙂

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