मछली बेचना और भाषण देना दो बिल्कुल अलग बातें हैं – 12 जनवरी 2014

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

सन 2006 की शुरुआत में, जब मैं अभी आस्ट्रेलिया में ही था, मेरे साथ एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने मुझ पर ज़ाहिर किया कि आध्यात्मिक माहौल बहुत व्यावसायिक हो गया है। मैं एक अध्यात्मिक बाज़ार में उपस्थित था-और उसके लिए काम न करने के मेरे निर्णय ने मेरे आयोजकों को आश्चर्यचकित और निराश कर दिया।

पूरी कथा बयान करनी हो तो बता दूँ कि मेरे आयोजक भी वहाँ अपना स्टाल लगाने वाले थे और जब हम वहाँ पहुंचे, उन्होंने बताया कि सप्ताहांत के लिए उन्होंने कोई कार्यशाला नहीं रखी है और उसकी जगह इस अपेक्षा में मुझे यहाँ ले आए हैं कि मैं दूसरों की मदद करने का अपना काम वहाँ करूं। पहले भी मैं ऐसे आयोजनों में शिरकत कर चुका था और उनके विषय में मेरे मन में कोई पुख्ता विचार नहीं बन पाए थे। मैं पहले सिर्फ एक दर्शक के रूप में ही इन कार्यक्रमों में शामिल हुआ था, वक्ता के रूप में नहीं, लेकिन मैं जानता था कि वहाँ बहुत से कार्यक्रम एक साथ व्यवस्थित रूप से आयोजित होते रहते हैं, जैसे अक्सर बड़े मॉल में ख़रीदारी का अनुभव होता है, कुछ-कुछ उस तरह। इसलिए इस बार भी मैं यूं ही चला गया था कि देखते हैं, क्या नज़ारा देखने-समझने को मिलता है।

हम एक बहुत विशाल इमारत तक आए, जहां यह आयोजन हो रहा था और मेरे आयोजक मुझे सीधे अपने स्टाल में ले गए, जिसे उन्होंने एक दिन पहले ही तैयार कर रखा था। उस हाल से गुजरते हुए मैंने दूसरे प्रदर्शकों के स्टालों पर नज़र दौड़ाई। लोग क्रिस्टल्स (स्फटिक), एंजेल-कार्ड, आध्यात्मिक पुस्तकें, सिंगिंग बौल्स (बजाने वाले बर्तन) और बहुत सी उपहार में देने योग्य वस्तुएँ बेच रहे थे। वहाँ अपने अपने स्टाल लगाए टेरो कार्ड से भविष्य बताने वाले लोग थे, अतीन्द्रियदर्शी और ज्योतिषी बैठे हुए थे। आप अपने प्रभामंडल का फोटो प्राप्त कर सकते थे, कई विभिन्न तरीकों से अपना भविष्य जान सकते थे और पर्दों से पृथक्कृत छोटे-छोटे केबिनों में अपनी मालिश करवा सकते थे। बगल में स्थित कुछ बड़े हालों में कई कार्यक्रम भी वहाँ चल रहे थे, जहां गुरुओं आदि के व्याख्यानों के टाइम-टेबलों की घोषणाएँ हो रही थी और उनके पर्चे बांटे जा रहे थे। वह एक तरह का आध्यात्मिक सुपरमार्केट ही था, एक मेला, जहां ऊर्जा को खरीदना-बेचना सहज रूप से चल रहा था।

हाल की तरफ निकलने वाले मुख्य रास्ते पर स्थित मेरे आयोजक का स्टाल भी काफी बड़ा था। आखिर, वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपनी सारी योजना के बारे में मुझे बताया। उसने मुझसे कहा, "हम अपने स्टाल का एक छोटा सा हिस्सा पर्दों की सहायता से ढँक देते हैं और आप अपना व्यक्तिगत सत्र यहीं लगा सकते हैं। और बाद में हम आपके प्रवचन के स्थान और समय की घोषणा कर देंगे। उस वक़्त यहाँ बहुत से लोग मौजूद होंगे और आसपास घूम रहे लोगों में जिनकी इस विषय में रुचि होगी, वे आपका प्रवचन सुनने वहाँ आ जाएंगे!"

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया, उन्हें क्या कहूं कि मैं क्या सोच रहा हूँ। आखिर मैंने कहा "यहाँ बहुत हल्ला-गुल्ला है", जो ज़ाहिरा तौर पर दिखाई भी दे रहा था, और फिर उन्हें समझाना शुरू कर दिया कि सलाह-सत्र (counseling session) हेतु सिर्फ पर्दे लगाकर इस शोर-शराबे और दूसरे व्यवधानों को दूर नहीं किया जा सकता। इस कार्यक्रम में विश्रांति के लिए कोलाहल रहित सम्पूर्ण एकांत चाहिए! इसके अलावा मैं इस तरह व्याख्यान नहीं दे सकता, जैसे कोई मछली-बाज़ार लगा हो और हर मछली बेचने वाला अपनी मछली की प्रशंसा करता हुआ चीख रहा हो: मछली ले लो, सस्ती स्वादिष्ट मछली! व्याख्यान देते समय मुझे व्याख्यान पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है, अपने श्रोताओं की आँखों में आंखे डालकर देखना होता है, जिससे मैं उनकी प्रतिक्रिया का अंदाज़ा ले सकूँ और फिर मैं अपने व्याख्यान पर उनसे भी एकाग्रता की अपेक्षा करता हूँ! बार-बार लोग ताक-झांक करें या आकर बैठें और जब उन्हें लगे कि उनकी इसमें रुचि नहीं है तो वापस चले जाएँ, यह सब मुझे मंजूर नहीं है। मैं किसी चीज़ का विज्ञापन नहीं करना चाहता और न ही कुछ बेचने की कोशिश कर रहा हूँ!

किसी ने, शायद मज़ाक में कहा कि "मुझे लगा यह व्यक्ति ध्यान का बहुत बड़ा विशेषज्ञ है और कहीं भी, कभी भी ध्यान लगा सकता है"। मैंने उससे कहा कि वह इस कला का उस्ताद होगा मगर मैं जानता था कि मैं ऐसा नहीं कर सकूँगा। मैं खुद भीड़-भाड़ में भी अपना ध्यान तो लगा सकता हूँ मगर जब मुझे दूसरों के साथ चर्चा भी करनी है तो मुझे बाहर भी एकाग्र होने की आवश्यकता होगी, अपने श्रोताओं पर मेरे व्याख्यान का असर भी मुझे जानना-समझना होगा और इसलिए मुझे उस भीड़ भरे बाज़ार जैसी जगह में अतिरिक्त शांति की आवश्यकता होगी!

मुझे लगता है कि मैं ऐसे मेलों के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ।