पिछले हफ्ते मैंने आपको एक माँ और उसकी बेटी के बारे में बताया था, जो मेरे पास व्यक्तिगत सत्र हेतु आई थीं। आज मैं आपको ऐसी ही एक और माँ और उसकी बेटी के बारे में बताना चाहता हूँ, जो मुझसे मदद चाहती थीं। यह भी एक ऐसा मसला था, जिसमें आपके लिए पुनः एक नैतिक संदेश छिपा हुआ है, जिसे मैं आपके सामने खोलकर नहीं रखूँगा क्योंकि उससे इस प्रकरण में कोई लाभ नहीं होगा। इस विषय में आप स्वयं सोचें कि वह क्या हो सकता है:
यह महिला, जो खुद भी अभी युवा ही है, अपनी बेटी को लेकर मेरे पास आती है, जो अभी कुछ माह पहले ही अठारह वर्ष की हुई है। माँ ने बताया कि ठीक उन्नीस साल पहले उसका किसी के साथ विवाहेतर संबंध बन गया था। संयोग से उसकी मुलाक़ात एक नौजवान से हुई और हालांकि वह विवाहित थी, वह उसके साथ सोयी। एक बहुत मुख्तसर सा संबंध, जिसमें प्यार का नामोनिशान नहीं था और जो सिर्फ यह ज़ाहिर करता था कि पति-पत्नी के वैवाहिक संबंध ठीक नहीं चल रहे हैं। हालांकि, उनका विवाह उस महिला की उम्मीद से अधिक समय तक चला क्योंकि इसी बीच उसी व्यक्ति से, जिसके कारण वह अपने पति के साथ बेवफाई कर रही थी, वह गर्भवती हो गई।
उसे मालूम था कि वह गर्भवती तो हो गई है मगर बच्चे का बाप उसका पति नहीं है। उन दिनों का उसने ठीक-ठीक हिसाब लगाया और यह सच्चाई उस पर पूरी तरह ज़ाहिर हो गई कि उस, लगभग अनजान व्यक्ति के साथ बिताई कुछ रातों का ही यह प्रतिफल है। एक ऐसे व्यक्ति के साथ, जिससे उसका अब कोई संबंध नहीं बचा है। फिर भी उस महिला ने उस बच्चे को जन्म देने का निर्णय किया।
उसने किसी को नहीं बताया कि यह बच्ची उसके पति की बेटी नहीं है और जब भी कोई यह कहता कि ‘यह बच्ची बिलकुल अपने पिता पर गई है’ तो वह शर्म और संकोच में गुमसुम हो जाती थी। बच्ची की खातिर दंपति ने कोशिश की कि विवाह किसी तरह बना रहे। वह बच्ची को अपनी बेटी मानता था और उस पर जान छिड़कता था। वह उसके लिए राजकुमारी थी, फरिश्ता थी!
एक तरफ बच्ची के लिए उसके दिल में अपार मुहब्बत थी तो दूसरी तरफ अपनी पत्नी के साथ उसके संबंध मधुर कभी नहीं हो सके। जब बच्ची दस साल की थी तब उन्होंने सोचा कि सबके लिए यही अच्छा होगा कि वे तलाक ले लें।
फिर अगले आठ साल बाद बच्ची ने 18 साल पूरे किए। उसके पास वयस्क होने के बाद की बहुत सारी योजनाएँ थीं। उसने पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश की थी और जीवन को देखने का एक वयस्क नज़रिया अख़्तियार कर लिया था। मगर उसके अठारह साल पूरे होने के बाद माँ ने यह विस्फोट किया: उसने बेटी को बताया कि जिस पुरुष ने उसका लालन-पालन किया था वह उसका जैविक पिता नहीं है।
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इस बात का मतलब उस युवा लड़की के लिए क्या रहा होगा! ज़िंदगी के इस मोड़ पर जैसे उसके पैरों तले की ज़मीन ही खिसक गई हो! वह भावनात्मक रूप से टूट गई, उसके सामने पहचान का संकट उपस्थित हो गया। उसके सामने इस समस्या का कोई इलाज नहीं था क्योंकि इतने दिन उसे अंधेरे में रखने के कारण उसके लिए अपनी माँ भी विश्वास योग्य नहीं रही थी। अब उस पुरुष के बारे में वह क्या सोचे, जिसने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया, अपार प्रेम उँड़ेला? जो समझता रहा कि वह उसकी पुत्री है, जबकि दोनों के जींस भिन्न थे? और उस अनजान पुरुष के बारे में क्या, जिसके जींस उसके शरीर में समाए हुए हैं लेकिन जिसके बारे में उसे कोई कुछ नहीं बता सकता, सिवा उसके नाम के और सिवा इसके कि उन्नीस साल पहले वह इसी शहर में रहा करता था?
यह किसी बॉलीवुड या हॉलीवुड फिल्म की कहानी की तरह लगता है लेकिन यह एक सत्य घटना है। वे दोनों मेरे पास सलाह लेने आए थे, आश्वस्त होने, सहारा ढूँढ़ते हुए मदद मांगने आए थे। अगले सप्ताह मैं आपको बताऊंगा कि उनकी कहानी सुनने के बाद मैंने उनसे क्या कहा।
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