जर्मन कार में चाइल्ड सीट बेल्ट क़ानूनों के बारे में जानकारी लेते हुए- 28 जुलाई 2013

मेरा जीवन

सन 2005 में मेरे भाइयों में केवल यशेंदु ही नहीं था जिसने कि जर्मनी की यात्रा की हो बल्कि पूर्णेन्दु भी उसी साल जर्मनी की यात्रा पर आया था। यह उसकी भी जर्मनी की पहली यात्रा थी और स्वाभाविक ही यात्रा को लेकर वह भी बहुत उत्साहित था।

जब उसका फ्रैंकफ़र्ट आने का कार्यक्रम बना तब मैं डेनमार्क में एक कार्यक्रम में व्यस्त था और इसलिए मैंने अपने माइंज निवासी एक मित्र से कहा था कि उसे लेने वहाँ चला जाए। उसने ऐसा ही किया और पूर्णेन्दु उसके यहाँ एक दिन रहा। जर्मनी देखने का उसे समय ही नहीं मिल पाया और वह ग्रीस जाने वाला हवाई जहाज पकड़कर वहाँ आ गया, जहां आखिर मेरी उससे मुलाक़ात हुई। वहाँ हमने कुछ दिन अपने कार्यक्रम किए, अपने एक अच्छे मित्र के यहाँ कुछ दिन रहे और फिर साथ में वापस जर्मनी आ गए। कुछ दिन जर्मनी रहने के बाद पूर्णेन्दु का वापस भारत लौटने का समय आ गया।

एक मित्र उसे एयरपोर्ट छोडने जाने वाली थी। उसकी छह माह की एक बच्ची थी इसलिए ड्राईवर सीट पर हमारी मित्र बैठी, मैं उसके साथ वाली सीट पर बैठा और पूर्णेन्दु उस बच्ची के बगल में पीछे बैठा। बच्ची को बच्चों की कार सीट (चाइल्ड कार सीट) में अच्छी तरह से बेल्ट बांधकर बिठाया गया था। बच्चों की कार सीट! पूर्णेन्दु के लिए एकदम नई बात! मैंने दुनिया भर में अपने कई मित्रों के यहाँ पहले ही बच्चों की कार सीटें देख रखी थीं लेकिन भारत में ऐसा कोई रिवाज या कानून नहीं था। अब भी नहीं है।

रास्ते में हम लोग बातें कर रहे थे और पूर्णेन्दु बच्ची के साथ खेल रहा था। हम जब एयरपोर्ट से आधी दूरी पर थे, बच्ची बोर होने लगी और गुस्से में हाथ-पैर पटकने लगी। शायद उसे माँ की ज़रूरत थी। पूर्णेन्दु उसे बहलाने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसका कोई प्रयत्न सफल नहीं हो पा रहा था। आखिर, जब बच्ची ज़ोर-ज़ोर से रोने-चीखने लगी तो वह उसे गोद में लेकर चुप कराने की मंशा से उसका सीट बेल्ट खोलने लगा।

पूर्णेन्दु क्या कर रहा है, हमारी मित्र देख रही थी और उसे तुरंत रोका, "नहीं, सीट बेल्ट मत खोलिए! आप चलती गाड़ी में उसे बाहर नहीं रख सकते!" वह उत्तेजित हो उठी थी और पूर्णेन्दु और मैं आश्चर्यचकित होकर उसकी तरफ देख रहे थे। "लेकिन वह रो रही है", पूर्णेन्दु ने कहा। "ठीक है, उसे रोने दीजिए लेकिन जब गाड़ी चल रही हो, उसे बाहर निकालने की इजाज़त नहीं है! यह निरापद नहीं है! धीरे-धीरे इस बात को वह सीख-समझ जाएगी!" हमारी मित्र ने कहा। स्वाभाविक ही, पूर्णेन्दु रुक गया और उसे वैसे ही बहलाने की कोशिश करने लगा। सौभाग्य से, हम जल्द ही एयरपोर्ट पहुँच गए, हमने कार रोकी और तब बच्ची को सीट से बाहर निकाला।

उस दिन मैंने और पूर्णेन्दु ने जाना कि जर्मन कानून के अनुसार चलती कार में बच्चों को उनकी सीट में बिठाकर, सीट बेल्ट बांधकर रखा जाना ज़रूरी है। भारत में आज भी लोग बच्चों के लिए कार सीट का प्रयोग नहीं करते। अपरा के लिए कार सीट लेने हमें दिल्ली तक जाना पड़ा। भारत के लिए यह बहुत दूर की बात है और यहाँ ऐसा कानून लागू होने में अभी लंबा समय लगेगा।

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