अपनी स्वाधीनता और ज़िम्मेदारी: परिवार का समर्थन और प्रोत्साहन- 1 दिसंबर 2013

मेरा जीवन

मैं आपको पहले बता चुका हूँ कि सन 2005 में, जब मैंने अपने पिताजी से यह कहा कि मैं अब गुरु का काम नहीं करना चाहता और यह कि जिन धर्मग्रंथों का अनुसरण और अनुपालन मैं अतीत में किया करता था, अब नहीं करना चाहता तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी। उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा था कि अगर ऐसा करके मैं खुश हूँ तो सारा परिवार खुशी-खुशी मेरे साथ है। मुझे उनकी इस प्रतिक्रिया से कोई आश्चर्य नहीं हुआ था।

दरअसल मैं पहले से जानता था कि वे यही कहेंगे। मुझे थोड़ी सी भी आशंका नहीं थी कि वे कोई दूसरी बात कह सकते हैं और जब मैंने उनके शब्द सुने तो मैं याद कर रहा था कि कैसे पहले भी अपने निर्णयों में मुझे उनका समर्थन और प्रोत्साहन मिलता रहा था।

जब मैं सिर्फ 13 साल का था, मैंने अपना काम शुरू कर दिया था और क्रमशः अधिकाधिक व्यस्त होता जा रहा था। कभी-कभी मैं अपने पिताजी के साथ उनके कार्यक्रमों में भी चला जाता था मगर अब मैं स्वतंत्र रूप से अकेले ही देश भर में घूम-घूमकर अपने कार्यक्रम भी करने लगा था। स्वाभाविक ही ऐसे कार्यक्रम सिर्फ स्कूल की छुट्टियों में ही नहीं होते थे इसलिए मुझे अक्सर स्कूल में अनुपस्थित रहना पड़ता था।

उस वर्ष अपने किसी कार्यक्रम के बाद जब मैं स्कूल आया तो मेरे एक शिक्षक ने पूछा कि मैं कहाँ था और मैं स्कूल क्यों नहीं आता। मैंने उन्हें बताया कि मैं दूसरे प्रांत, मध्य प्रदेश प्रवचन करने गया हुआ था। उन्हें पहले से पता था कि मैं क्यों स्कूल में अनुपस्थित रहता हूँ इसलिए उन्होंने पूछा: "जब तुम अक्सर स्कूल नहीं आते तो स्कूल आना पूरी तरह क्यों नहीं छोड़ देते?" उनकी बात का अर्थ यह था कि मैंने जब अपने पेशे का चुनाव कर लिया है तो स्कूल की चिंता छोड़कर पूरा ध्यान उस पर लगाना चाहिए।

मुझे कुछ समझ में नहीं आया। दरअसल यात्राओं में मैं हमेशा अपने साथ अपनी कोर्स की किताबें भी साथ रखता था और स्कूल की पढ़ाई भी करने की पूरी कोशिश करता था। नतीजतन, स्कूल से दूर रहने के बावजूद मैं पढ़ाई में कभी खराब विद्यार्थी नहीं रहा! अब मेरे शिक्षक कह रहे थे कि मैं स्कूल ही न आऊँ। समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए।

उस दिन जब मैं घर आया तो मेरे मन में यह बात घूम रही थी और मैंने अपने अभिभावकों से इस विषय में क्या करना चाहिए, पूछा। मेरे पिताजी ने जवाब दिया: वही करो, जो तुम्हें उचित लगता है।

आप कह सकते हैं कि एक 13 साल के बच्चे के लिए इस बात का निर्णय करना बड़ा मुश्किल था। लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा। बल्कि मैं उत्साह से भर गया कि मेरे पिताजी मुझ पर इतना विश्वास करते हैं, उन्हें लगता है कि मैं अपने बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम हूँ और अपने दिल का कहा मानकर अपने बारे में कोई भी निर्णय लेने की मुझे स्वतन्त्रता है। और मैंने वही किया। मैंने अपना पेशा चुना, स्कूल नहीं।

इस बात ने मुझे एक साथ स्वतन्त्रता और ज़िम्मेदारी प्रदान की, अपनी प्रसन्नता और अपने हितों की रक्षा करने की मुझमें शक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया। उस समय सीखे हुए इस सबक के लिए मैं अपने अभिभावकों का सदा-सदा के लिए ऋणी रहूँगा। लगभग बीस साल बाद मेरे पिता ने फिर वही किया। जिन्होंने अपना जीवन ही धर्म की नीव पर खड़ा किया था और स्वयं एक धर्मगुरु थे और तब भी थे, जब उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अपने दिल का कहा मानूँ, भले ही उससे मेरी राह उस राह से अलग हो जाती थी, जिस राह पर वे स्वयं चलते रहे थे और मुझे भी चलने के लिए प्रेरित किया था।

इस तरह मैं जो भी हूँ, जो भी करूँ, अपने परिवार के लगातार समर्थन और प्रोत्साहन के लिए उन सभी का सदा के लिए ऋणी रहूँगा। हमने एक साथ अपनी जीवन-यात्रा शुरू की और मैंने कभी भी एक क्षण के लिए भी उन्हें मेरा साथ छोड़ते हुए नहीं पाया। वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे और उसी तरह मैं भी हमेशा उनकी इच्छाओं और निर्णयों के समर्थन में खड़ा रहूँगा। मैं समझता हूँ कि सिर्फ इसी तरह हम सब प्रसन्न रह सकेंगे!

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