स्पष्टीकरण: अब मैं जिस बात पर विश्वास नहीं करता वह काम नहीं कर सकता! 24 नवंबर 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

मैंने बताया था कि कैसे 2005 में मुझे लगा कि मुझे अपने जीवन में उस समय तक आ चुके परिवर्तनों के विषय में अपने परिवार वालों से बात करनी चाहिए। मैं यह भी सोच रहा था कि पता नहीं मेरे पिताजी, जिन्होंने अपना सारा जीवन एक गुरु के रूप में गुजारा था, कैसा महसूस करेंगे, जब मैं उन्हें बताऊंगा कि अब मैं कोई गुरु-वुरु नहीं हूँ और यहाँ तक कि मैंने धर्म से ही किनारा कर लिया है!

मैंने ऐसा समय चुना जब सारा परिवार एक साथ बैठा हुआ था और यह कोई मुश्किल बात नहीं थी क्योंकि हम सभी एक साथ भोजन किया करते थे। तो इस तरह एक बार फिर अपने सबसे नजदीकी लोगों के सामने, जिन पर मैंने सबसे अधिक भरोसा किया और जिन्हें मैं सबसे ज़्यादा प्रेम करता हूँ, दिल का गुबार निकालते हुए मैंने अपनी कहानी शुरू की।

मैंने गुफा से बाहर निकलने के बाद अपने अनुभवों के विषय में बताया। गुफा में लंबे एकांतवास के पश्चात मैं स्वयमेव एक बिल्कुल दूसरा व्यक्ति बन चुका था। मुझे अब दूसरों के साथ उस तरह जुड़ पाने में मुश्किल होती थी, जैसा कि पहले बहुत सहजता के साथ हो जाता था! मुझे अपनी बात को, अपने विचारों और धारणाओं में आए परिवर्तन को समझाने के लिए एक-एक शब्द ढूंढ़ना पड़ रहा था मगर परिवार के सभी सदस्यों ने मेरी बातें बहुत धैर्यपूर्वक सुनीं। मेरे लिए अब गुरु की भूमिका बिल्कुल अनुपयुक्त लग रही थी। धार्मिक विश्वासों के चलते जिन कामों को मैं पहले करता रहा था वे भी अब मुझे व्यर्थ लग रही थीं। मैं अब भी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर पर विश्वास करता था मगर उस शक्ति की परिभाषा मेरे लिए बदल चुकी थी। मैंने अपने धार्मिक कर्मकांड त्याग दिये थे और मैंने उन्हें बताया कि जिन विचारों और सिद्धांतों पर मैं पहले विश्वास करता था वे अब मुझे कतई विश्वसनीय नहीं लगते।

मेरे दिल का यह हिस्सा था, जो मुझे अपने गुरु वाले जीवन से दूर कर रहा था। मैं एक ईमानदार जीवन जीना चाहता था और अपने विचारों या भावनाओं और अपने व्यवहार में एकरूपता बनाए रखना चाहता था। मैं वह सब नहीं करना चाहता था, जिस पर अब मेरा विश्वास नहीं है या जिसे अब मैं ठीक नहीं समझता, भले ही पहले उन बातों पर मेरा दृढ़ विश्वास क्यों न रहा हो! इसके अलावा मैं नहीं चाहता था कि मैं उस बात के लिए किसी से कहूँ, जिस पर अब मैं खुद भी अमल नहीं करता। मेरे अंदर परिवर्तन इस रूप में हुआ था। अतीत के सभी शिष्यों से, वैसे भी, मैंने बिदा ले ली थी और किसी के साथ भी मेरा कोई संपर्क नहीं था। मेरे भाई-बहन और माता-पिता इस बात को पहले से जानते थे। जिनके साथ भी मैं मिलता था, उनके साथ भी मेरे संबंध अलग तरह के हो चुके थे। मैं उनके साथ अलग ढंग से बात करता था, अभी भी उन्हें और उनकी परिस्थितियों को मनोवैज्ञानिक रूप से परखता हुआ मगर एक मित्र या परिचारक के रूप में, उन्हें व्यावहारिक सलाह देते हुए, न कि एक गुरु के रूप में। सारी बातें उनके सामने खोलकर रखने के बाद आखिर मैंने परिवार के सभी सदस्यों पर नज़र डाली कि अब मुझे उनकी क्या प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।

न तो उन्हें कोई झटका लगा था न ही बहुत आश्चर्य हुआ। वे पहले से मुझमें और मेरे व्यवहार में क्रमशः आते परिवर्तनों को देख रहे थे। फिर भी, मेरे भीतर आए इन परिवर्तनों के विषय में इतने विस्तार से सुनना उनके लिए नई बात ही थी। यह कदम उठाने के लिए, जो मेरे अभिभावक जीवन में कभी भी उठा नहीं सकते थे, मैं क्यों और कैसे प्रवृत्त हुआ! अब वे सब कुछ मेरे मुख से सुन चुके थे और सभी ने उसे शांतिपूर्वक ग्रहण किया।

सभी बहुत गंभीरता और रुचि के साथ मुझे सुन रहे थे और जब मेरी बात समाप्त हुई तो भावुकतावश मेरे पिताजी के मुख से कुछ देर कोई बोल नहीं निकल सका। बड़ी मुश्किल से उन्होंने जो कुछ कहा वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था और मन में गहरे उतर गया: "हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि तुम क्या सोचते हो। अगर तुम इसमें खुश हो तो हम भी खुश हैं। जो भी तुम्हारे अनुभव हैं, जो तुम्हारा मन कहता है, जो भी तुम्हारे विचार तुमसे कहते हैं, वही करो!"

सभी को अपनी राह खुद चुननी होती है।