मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि 2005 में मेरा बहुत लोगों से परिचय हुआ और उनमें से कई मेरे दोस्त भी बने। आज मैं आपको अपने एक मित्र के बारे में बताना चाहता हूँ जिसकी आंखे खोलकर मैंने उसके गुरु की असलियत का पर्दाफाश किया था। यह व्यक्ति सबसे पहले कुछ व्यक्तिगत, भावनात्मक मामलों में सहायता मांगने के लिए वैयक्तिक सत्र हेतु मेरे पास आया था। बातों बातों में उसने अपनी समस्या बताई तथा मैंने उसे उस बारे में अपना दृष्टिकोण बताया। उसे अच्छा लगा और हमने न केवल वह सत्र पूरा किया बल्कि बाद में वह हमारे ध्यान सत्र में भी आने लगा और फिर एक दिन उसने मुझे अपने घर पर आमंत्रित किया। हम दोनों काफी करीब आ चुके थे और मुझे भी नई जगहों पर कार्यक्रम देना पसंद था, इसलिए मैंने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। जब मैं उसके घर गया तो उसने और उसकी पत्नी ने वह सब किया जिससे मैं सहज महसूस करूँ और मैं बहुत जल्दी सहज हो भी गया। मैंने देखा कि उसके घर में एक भारतीय व्यक्ति की कुछ तस्वीरें दीवारों पर लगाई गई हैं, जिसे मैं एक लोकप्रिय गुरु के रूप में पहले से जानता था और जो पश्चिमी देशों की यात्रा करता रहता है और वहाँ अपने शिष्य बनाता रहता है। मेरे दोस्त ने अपने गुरु का परिचय दिया, और जब हम बाद में साथ बैठे थे, उसने अपने शर्ट के भीतर हाथ डालकर एक तावीज़ निकाला और बोला, "उन्होंने यह तावीज़ मेरे लिए ‘प्रकट’ किया है।"
ओह, अब मेरा बुरा हाल था! मैं अपने दोस्त को बहुत पसंद करता था और मुझे लग रहा था कि वह गुरु, जिस पर उसका सहज विश्वास था, उसे बेवकूफ बना रहा है। मुझे क्या कहना चाहिए? मैं सोच में पड़ गया। क्या मुझे यूं ही अपना सर हिलाते रहना चाहिए जैसे मैं भी इन बेहूदी अलौकिक बकवास पर भरोसा करता हूँ। मैं जानता हूँ कि ये लोग हाथ की सफाई और जादू की घटिया चालबाज़ियों द्वारा लोगों को आकर्षित करते हैं और अपना अनुयायी बनाने में सफल होते हैं।
बात को लंबा न खींचते हुए मैंने बहुत सतर्कता के साथ अपने मित्र से कहा कि उसे बेवकूफ बनाया गया है। पहले उसे मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ लेकिन मैंने उसके सामने और भी कई रोचक उदाहरण प्रस्तुत किए जिनमें कैमरे के सामने ऐसे धोखेबाज़ गुरुओं का पर्दाफाश किया गया था जब वे अपने शर्ट की बांह से ऐसे ही तावीज, राख आदि ‘प्रकट’ करते थे, यहाँ तक कि सोने के छर्रे भी उनके हाथ में लुढ़कते चले आते थे जो दरअसल उनके रुमाल में छिपाकर रखे हुए होते थे।
मैं बहुत नम्र और सौम्य स्वर में अपनी बात रखने की कोशिश कर रहा था क्योंकि मैं जानता था कि यह रहस्योद्घाटन उसके लिए कितना तकलीफदेह हो सकता है। कुछ लोग वास्तव में इतने निष्ठावान होते हैं कि जब पता चलता है कि उनका गुरु महज एक साधारण ठग है तो उनका दिल टूट जाता है। मेरा यह मित्र भी अपने गुरु के प्रति मोहग्रस्त था और स्वभाव से ही वह भोलाभाला और तुरंत भरोसा कर लेने वाला व्यक्ति है और यह बात मुश्किल और बढ़ा देती है। यह समझते हुए मैंने अपनी बात को सावधानी के साथ एक एक शब्द का चुनाव करते हुए उसके सामने रखा, मगर साथ ही इन नीम-हकीमों के बारे में अपने विचार भी बहुत स्पष्ट ज़बान में व्यक्त कर दिये।
आश्चर्यजनक रूप से उसकी प्रतिक्रिया त्वरित और साथ ही पीड़ारहित भी रही। मेरे मित्र ने तुरंत ही वह तावीज उतारकर रख दिया और अपने तथाकथित गुरु के चित्र भी निकाल डाले। उसके मोह का निवारण हुआ था और बाद में मैं जब भी उसके घर गया, न तो उसके गले में तावीज लटका देखा, न उस ढोंगी गुरु के चित्र उसके यहाँ देखे। बहुत दिनों बाद जब भी उस गुरु का ज़िक्र आता, हम दोनों उसकी चालबाज़ियों का मज़ाक उड़ाते।
लेकिन एक छोटी सी बात मेरे दिमाग में आज भी आती रहती है: उसका हृदय-परिवर्तन कुछ जल्दी नहीं हो गया? वह मुझे बहुत अच्छी तरह से जानता भी नहीं था और मेरे कहे कुछ वाक्यों के बाद ही उसने उस व्यक्ति को निकाल बाहर किया जिसे वह इतने दिनों से एक संत मानता था। मैंने सोचा कि इस संशय को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए क्योंकि इससे हमारी मित्रता में दरार पड़ सकती है। बाद में मुझे महसूस हुआ कि यह बात मेरे मित्र के एक अस्थिर-दिमाग होने की पहली निशानी थी और वह बहुत जल्दी अपने निर्णय को बदल भी सकता था।
Related posts
जब पिता ज़िंदा होकर भी मेरे नहीं थे…
पिता के साथ मेरा सम्बन्ध
जीवन का नया अध्याय, चुनौतियाँ और सबक
11 साल की उम्र में यौन शोषण की शिकार मेरी बहन को न बचा पाने की ग्लानि
भारत में मेरे परिवार ने मेरी पीठ में छुरा घोंपा है
दुनिया भर के राजाओं की एक सी रुचियाँ: पैसा, युद्ध और औरतें – 17 जनवरी 2016
अपरा का चौथा जन्मदिन समारोह – 10 जनवरी 2016
हमें घनिष्ट रूप से जुड़ना पसंद है – एक कैनेडियन योग दल का आश्रम आगमन – 13 दिसंबर 2015
जर्मनी के खूबसूरत दौरे से भारत वापसी – 6 दिसंबर 2015
