आश्रम में पहले दीवाली कैसे मनाई जाती थी! 3 नवंबर 2013

आज दीवाली है, दुनिया भर में मनाया जाने वाला भारत का सबसे बड़ा उत्सव! यह रोशनियों का त्योहार है और हर चीज़ सजाई जाती है, मिठाइयाँ बनाई जाती हैं और नए कपड़े पहने जाते हैं। मैं 2005 और उससे पहले की दीवाली को याद करता हूँ और मुझे ध्यान आता है कि तब मेरे लिए दीवाली उतना महत्व नहीं रखती थी।

मेरे बचपन में कई बार दीवाली पर हमारे पिताजी घर पर नहीं होते थे क्योंकि वे दूसरे शहरों में प्रवचन देने गए हुए होते थे। स्वाभाविक ही हमारी माँ को यह अच्छा नहीं लगता था लेकिन कई दूसरे त्योहार हम सब एक-साथ मनाते थे। जब मैं यात्रा पर होता था, देश में या विदेशों में, तब मैं भी कई बार दीवाली पर वृन्दावन में नहीं होता था। लेकिन पहले मैं आपको बताता हूँ कि जब मैं आश्रम में होता था तब आश्रम की दीवाली का स्वरूप कैसा हुआ करता था।

तब मेरे माता-पिता और बहन शहर में हमारे पुराने घर में रहा करते थे और हम तीन भाई संस्कृत के कुछ विद्यार्थियों और आश्रम के कर्मचारियों के साथ आश्रम में रहते थे। आश्रम पूरी तरह पुरुषों का इलाका था, जहां सिर्फ एक व्यक्ति को खाना बनाना आता था और उसी पर रसोई और घर की साफ-सफाई की ज़िम्मेदारी थी। बिना किसी महिला के वही सारे काम अंजाम देता था-लेकिन बिना महिला के दीवाली का माहौल ही नहीं बन पाता था।

वैसे, मेरी बहन नियमित रूप से आश्रम आती रहती थी और कभी-कभी माँ भी आ जाती थी। दीवाली के दिन मेरे माता-पिता और बहन नए कपड़े पहनकर आश्रम आते थे और हम आश्रम को सजाते थे और फिर परंपरागत तरीके से कुछ तेल के दिये भी जलाते थे। अम्माजी मिठाइयाँ बनाकर लाती थीं, जिन्हें आश्रम के बच्चों और कर्मचारियों में बांटा जाता था। वैसे भी हम सब भाई शहर वाले मकान में ही खाना खाते थे और दीवाली के दिन हम कुछ जल्दी वहाँ पहुँच जाते थे, जिससे उनके साथ कुछ अधिक समय व्यतीत कर सकें, उनके साथ त्योहार मना सकें, मिठाइयाँ खा सकें।

मैं इस त्यौहार को इतना महत्व नहीं देता इसी लिए 2005 में मैं भी आश्रम में उपस्थित नहीं था। यही वह साल है जब हमारे जर्मन मित्रों ने आश्रम में अपना विवाह रचाया था और हनीमून के लिए हिमालय चले गए थे। वहाँ से लौटकर वे फिर हमारे आश्रम में दीपों का त्योहार, दीपावली मनाने के लिए रुक गए थे। मुझे याद है कि उन्होंने इस त्योहार का भरपूर आनंद उठाया था और यह भी कि मेरा परिवार भी ऐसे शुभ दिन मेहमानों का स्वागत करके बड़ा प्रसन्न हुआ था। उन्होंने त्योहारों पर अम्माजी और मेरी बहन द्वारा पकाए गए खास व्यंजनों का मज़ा लिया। खाने के पश्चात उन्हें दीवाली की खास भारतीय मिठाइयाँ खिलाई गईं। उन्होंने ऐसी मिठाइयाँ पहली बार खाई थीं। उनके और मेरे परिवार के लिए भी वह एक यादगार रात थी। अगले साल भी वे लोग आए और हमारे साथ मिल-जुलकर इस त्योहार का खूब मज़ा लिया।

आप दीवाली मनाते हों या न मनाते हों, मैं कामना करता हूँ कि दीवाली का यह दिन आपके जीवन में प्रेम, उजाला, उल्लास और सौभाग्य लेकर आए।

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