आइए, मिलजुलकर उन किसानों की मदद करें, जिनकी फसल पूरी तरह बरबाद हो गई है! 12 अप्रैल 2015

मेरा जीवन

पिछले रविवार को मैंने हमारे इलाके में हुई भयंकर ओलावृष्टि के बारे में आपको बताया था। जहाँ हमारा नुकसान सिर्फ इतना ही हुआ कि आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी’ज के विज्ञापन-बोर्ड में एक बड़ा सा छेद हो गया और कार में कुछ डेंट्स लगे वहीं हमारे इलाके के बहुत से लोगों का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है, और आज भी हो रहा है! जलवायु-परिवर्तन और उसके दुष्परिणामों ने भयंकर तबाही मचाई है और बहुत से लोग जान से हाथ धो बैठे हैं! और हम उनकी मदद करना चाहते हैं!

पिछले कई हफ्तों से हमारे यहाँ बड़ा असामान्य मौसम रहा। सामान्यतया, इस समय गरम और सूखा मौसम होना चाहिए लेकिन इस बार कुछ दिन तो गर्मी पड़ती है, सूरज निकलता है और फिर दो या तीन दिन तक लगातार बारिश होती है, तेज़ हवाएँ चलने लगती हैं। यह ब्लॉग लिखते समय भी आसमान में काले बादल छाए हैं और लगता है बारिश भी होगी। इसके अलावा हमेशा इस समय तक फसल कटकर खलिहानों में आ जाती है, गेहूँ गोदामों में आने लगता है, जब कि इस बार बारिश के कारण फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा है, आंधी-पानी के कारण गेहूँ खेतों में बिछ गया है, बहुत सा सड़ गया है, नष्ट हो गया है!

इसलिए रोजाना ऐसी खबरें आ रही हैं कि खेतों को देखकर सदमे से किसानों को दिल के दौरे पड़ रहे हैं, कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है। अपनी फसलों के साथ खुद किसान भी तबाही झेल रहे हैं और अपनी जान तक लेने में नहीं हिचकिचाते! हमारा अखबार बताता है कि आज ही पिछले 24 घंटों में हमारे उत्तर प्रदेश में 44 किसान जान से हाथ धो बैठे हैं, जिनमें से 14 हमारे ही इलाके के किसान हैं। इनमें से कुछ किसानों की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई है लेकिन बहुत से किसानों ने अपनी बरबादी से तंग आकर आत्महत्या कर ली है। अब तक कुल मिलाकर 2500 करोड़ रुपए यानी लगभग 400 मिलियन डॉलर कीमत की फसल नष्ट हो गई है।

अगर आप किसी ऐसे देश में रह रहे हैं, जहाँ प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के पर्याप्त सुरक्षा इंतज़ाम होते हैं, तो आपको आश्चर्य हो सकता है कि सिर्फ किसी साल अतिवृष्टि हो जाने के कारण कोई आत्महत्या भी कर सकता है! जी हाँ, कर सकता है और क्यों कर सकता है, मैं आपको समझाता हूँ: भारत में अनेक ऐसे किसान हैं, जिनके पास अपनी कोई ज़मीन नहीं होती। वे बहुत सारा कर्ज़ लेकर किसी बड़े किसान के खेत किराए पर लेते हैं और कर्ज़ लेकर ही खाद-बीज खरीदते हैं। उनका सारा पैसा और मेहनत इसी खेती में झोंक दी जाती है-और अब सारी फसल चौपट हो गई है। वे मेढ़ पर खड़े-खड़े उस चौपट खेती को निहार रहे होते हैं जबकि उनके पास हाथ में एक पैसा नहीं होता, खाने के लाले पड़े होते हैं। ऊपर से लंबा चौड़ा कर्ज़ अलग से खड़ा हो चुका होता है, जिस पर ऊँची दर से ब्याज की अदायगी भी करनी है!

यहाँ, भारत में खराब मौसम और बरबाद फसल के एवज में बीमा जैसी कोई चीज़ नहीं होती। ऐसी स्थिति में वे सदमे की हालत में पहुँच जाते हैं और बहुत से तो दिल का दौरा पड़ने से मारे जाते हैं। और दूसरे इतने विषादग्रस्त हो जाते हैं कि उन्हें मृत्यु के सिवा इस जंजाल से बाहर निकलने का दूसरा कोई विकल्प नहीं सूझता।

ऐसे में सरकार उनकी मदद के लिए आर्थिक सहायता लेकर आती है लेकिन जिन किसानों को इस मदद पर भरोसा होता है, वे भी जल्द ही निराश हो जाते हैं क्योंकि जो मुआवजा उनको दिया जाता है वह बहुत कम होता है और बहुतों को तो वह भी नहीं मिल पाता। वास्तविकता यह है कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है, जिन्हें मदद की दरकार है और सरकार इस मद में पर्याप्त रकम आवंटित ही नहीं करती। इसके अलावा सरकारी मशीनरी में लालफ़ीताशाही और भ्रष्टाचार भी बहुत है।

हमारे स्कूल के कई बच्चे भी ऐसे ही किसानों के बच्चे हैं। कल हमारे पास उनमें से कुछ लोग आए थे और अपनी व्यथा-कथा कह रहे थे। यह बहुत ही दर्दनाक है!

सरकार के अलावा कुछ निजी संगठन भी आगे आए हैं और अपनी क्षमता के अनुसार भरसक किसानों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं। जब हम किसानों की ऐसी परिस्थिति देखते हैं तो हम भी महसूस करते हैं कि हमें भी उनकी हरसंभव सहायता करनी चाहिए!

पैसे के कारण लोग मृत्यु का वरण कर रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए और हम भरसक हर जगह, हर तरह की मदद करना चाहते हैं! स्वाभाविक ही हम अकेले ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते और इसलिए हम आपसे मदद की गुजारिश करते हैं! अगर आपको हमारे इलाके के किसानों से सहानुभूति है, अगर आप उनकी मदद करना चाहते हैं, जिनकी फसल बरबाद हो गई है तो उनकी मदद जैसे भी बन पड़े, जरुर करें!

शुक्रिया!

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