चैरिटी कार्य: कृतज्ञता की जगह शिकायतें लेकिन फिर भी हम पुरस्कृत महसूस करते हैं – 24 मई 2015

अपने स्कूली बच्चों के लिए स्थान की खोज और नए स्कूली सत्र के लिए बच्चों की भर्ती आदि के दौरान जो भी बातें स्कूल में हुई हैं, उनके बीच चैरिटी के संबंध में बहुत से विचार मेरे मन में आते रहे हैं, जिन्हें मैं आज आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।

वास्तव में हम बहुत काम करते हैं और कड़ी मेहनत करके हम न सिर्फ अपने चैरिटी स्कूल को चला रहे हैं बल्कि अपने व्यवसाय का प्रबंधन भी करते हैं, जो अंततः हमारे चैरिटी कार्यों का मूलाधार है, जिसके बगैर हम एक कदम भी आगे नहीं रख सकते। हमें अपने काम से प्यार है, विशेष रूप से इसलिए कि वह दोनों के लिए उपयोगी है-उन लोगों के लिए, जो योग कार्यशालाओं में भाग लेने और आयुर्वेदिक विश्रांति हेतु यहाँ आते हैं और उन गरीब बच्चों के लिए भी, जो हमारे स्कूल में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते हैं। हम कहा करते थे कि वास्तव में यह हमारे लिए पुरस्कार मिलने जैसा है। लेकिन उसका वास्तविक अर्थ क्या है?

आप शायद यह सोचें कि चैरिटी कार्य से संतोष प्राप्त होता है, सफल होने का अनुभव होता है क्योंकि बहुत से लोग आपकी मदद का शुक्रिया अदा करते हैं। हमारे मामले में ऐसे लोग वे गरीब बच्चे होते हैं, जो हमारे यहाँ शिक्षा प्राप्त करते हैं और उनसे अधिक, स्वाभाविक ही, उन बच्चों के माता-पिता।

बहुत से चैरिटी कार्यों में, कई लोगों के लिए यह बात सही हो सकती है कि बहुत से लोग उनकी मदद के लिए उनसे कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और बाहर भी उन्हें काफी सम्मान मिल जाता है। बहुत से लोग चैरिटी का काम आवश्यक रूप से सिर्फ दूसरों की मदद के लिए नहीं करते बल्कि खुद उन्हें वैसा करके संतोष और सुख मिलता है। भीतर से उन्हें इस बात का एहसास होता है कि वे बहुत अच्छे व्यक्ति हैं क्योंकि वे दूसरों के लिए कुछ कर रहे हैं। या बाहर भी, यार-दोस्त और कई बार अनजान लोग भी उनकी बड़ाई करते हैं कि वे बड़े परोपकारी व्यक्ति हैं। स्वाभाविक ही, आदर्श रूप से यह अंतिम बात परोपकार के लिए प्रेरित करने का कारण नहीं होना चाहिए-लेकिन अगर इससे आपको दूसरों की भलाई के काम करने में मदद मिलती है तो मेरा उससे कोई विरोध भी नहीं है।

लेकिन आप विश्वास नहीं करेंगे कि कई बार हम अविश्वास से एक-दूसरे का मुँह ताकते रह जाते हैं कि किसी महत्वपूर्ण चैरिटी कार्य के लिए कितनी कम ‘पहचान और कृतज्ञता’ हमें मिल रही है।

किसी दूसरे निजी व्यावसायिक स्कूल को प्रेरित करने के लिए निश्चित ही अपर्याप्त कि वह हमारी क्षमता के अनुरूप फीस लेकर थोड़े से बच्चों को भर्ती कर ले और अपने यहाँ पढ़ने का मौका दे और इस तरह बहुत छोटे पैमाने पर ही सही, हमारे उदाहरण का अनुकरण करने की कोशिश करे! अगर मैं कहूँ कि उनके ऐसा न करने के कारण मुझे कोई दुख नहीं हुआ या निराशा नहीं हुई, तो मैं झूठ बोल रहा होऊँगा।

लेकिन नहीं, वैसे मुझे किसी बाहरी मान्यता की परवाह नहीं है। मेरे अपने बहुत से प्रायोजक और समर्थक हैं, जिनका सहयोग मेरे लिए पर्याप्त है और जहाँ हम आर्थिक कठिनाइयों के चलते असमर्थ महसूस करेंगे, वहाँ हम कोई नया तरीका ढूँढ़ेंगे, जिससे अपनी योजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वित कर सकें! वास्तव में बात यह है कि जिन परिवारों की हम मदद कर रहे होते हैं, उनकी बातें सुनकर भी हम अक्सर आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

सबके लिए एक साथ, एक ही बात कहना ठीक नहीं होगा मगर एक बार हम इसका सामान्यीकरण करें तो पाते हैं कि ये परिवार हमसे हमारी क्षमता से अधिक की मांग करते हैं। इस बात के लिए वे कृतज्ञ नहीं हैं कि उनके दो छोटे बच्चों को हम पढ़ा रहे हैं बल्कि उन्हें इस बात की शिकायत है कि उनके दो बड़े बच्चों के लिए हमारे पास स्थान नहीं है! विशेष रूप से जब रमोना और पूर्णेन्दु उनके घर जाते हैं तब कई परिवार उन्हें घेर लेते हैं-जिनके बच्चे प्रतीक्षा सूची में होते हैं या जो लोग एक या दो दिन देर से हमारे यहाँ आए हुए होते हैं, लिहाजा जिनके बच्चों का प्रवेश नहीं हो पाता।

हमारी कुछ सीमाएँ हैं और जब कक्षाएँ भर जाती हैं तो हमें उनसे ‘नहीं’ कहना ही पड़ता है। सीमाएँ हमेशा रहेंगी और इस तरह कुछ अभिभावक हमेशा ऐसे होंगे, जो हमारे प्रति पूर्णतः कृतज्ञ नहीं होंगे और अतिरिक्त मदद की अपेक्षा करते ही रहेंगे।

इस तरह, हमारा काम ऐसा है कि न सिर्फ बाहर से हमें कृतज्ञता प्राप्त नहीं होती या संतोष प्राप्त नहीं होता बल्कि भीतर से भी हम असंतुष्ट रह जाते हैं! अभिभावकों से हमें धन्यवाद ज्ञापन प्राप्त नहीं होते लेकिन उससे हमें यह पता चल जाता है कि हम जो कर रहे हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण काम है और उसे किया जाना अत्यंत आवश्यक है। वह इतना बहुमूल्य काम है कि इसकी लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा जरूरत है। हमारी परियोजना भले ही छोटी हो, लेकिन हम इस दिशा में कुछ न कुछ कर रहे हैं। उनके लिए, जो इसके बगैर कभी भी विद्यार्जन नहीं कर पाते। जो सदा सदा के लिए अपढ़ रह जाते। आने वाले बेहतर कल के लिए, जब वे अपने माता-पिता से बेहतर जीवन बिता पाएँगे, अपने परिवार का अच्छी तरह भरण-पोषण कर पाएँगे और उन्हें इस बात की चिंता नहीं होगी कि उनके पास खाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस दिशा में यह हमारा योगदान है और यह सच है और इसमें कोई शक नहीं है: और हाँ, किसी गरीब बच्चे की मुस्कान में ही हम असीम कृतज्ञता के दर्शन कर लेते हैं!

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