पिछले हफ्ते मैंने आपसे कुछ पश्चिमी महिला प्रवासियों का ज़िक्र किया था कि कैसे सन 2006 में होली उत्सव के दौरान भारत में उन्हें बहुत ही कटु अनुभवों से गुज़रना पड़ा था. घटना के तुरंत बाद और कुछ दिन बाद पुनः मेरी उनसे चर्चा होती रही थी और उनमें से एक महिला द्वारा कहा गया एक वाक्य मेरे दिमाग में बारम्बार बजता रहा था: 'जिस बात से मैं सबसे ज़्यादा अचंभित हूँ वह यह है कि भारत में भी ऐसी घटनाएँ हो सकती हैं! इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी!'
अब, आज के नज़रिये से आप कह सकते हैं कि यह कैसा नासमझी से भरा हुआ बयान है, जबकि, सभी जानते हैं कि महिला सुरक्षा के मामले में भारत एक मुश्किल देश है. जिसने भारत की संस्कृति के बारे में थोड़ा सा भी पता किया है वह जानता है कि इस देश में महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा हासिल नहीं है और दूसरी कई बातों के साथ इस पर भी बहुत परिश्रम किया जाना बाकी है. लेकिन फिर भी, खासकर आध्यात्मिक रुचियों वाले, योग-प्रेमी और भारतीय दर्शन की विरासत पर मंत्रमुग्ध लोग भारत के विषय में बिल्कुल अलग तरह की कल्पनाएं मन में लिए रहते हैं. जब तक वे अपने देशों में होते हैं भारत को रंगीन चश्मे से देखने के आदी होते हैं. और जैसे ही वे भारत पहुँचते हैं वे पाते हैं कि एक भयंकर सदमा उनका इंतज़ार कर रहा है!
उस वक़्त तक मैं कई साल विदेशों में गुज़ार आया था और जानता था कि भारत के बारे में यह बहुत असामान्य सोच नहीं है. वहाँ लोग भारत को एक स्वर्ग की तरह देखते हैं, परियों के देश जैसी कोई जगह, जहाँ सब योग करते हैं और अहिंसा पर विश्वास रखते हैं. जहाँ लोग विश्व-शांति के लिए दैनिक प्रार्थनाएं करते हैं और अपराधों से दूर रहते हैं क्योंकि उनके जीवन का सब कुछ प्रेम के इर्द-गिर्द घूमता रहता है. जहाँ हर व्यक्ति दूसरे को स्वतंत्रतापूर्वक जीने की आज़ादी देता है और दूसरों की सीमाओं का आदर करता है. जहाँ किसी को अपने लाभ की चिंता नहीं होती बल्कि सब एक दूसरे की सहायता करते हैं.
मैंने अपने कई मित्रों को आगाह किया है और उनकी गलतफहमी दूर करने की कोशिश की है. इसके अलावा मैंने लोगों को भारत से अपने तय समय से पहले वापस लौटते देखा है क्योंकि वहाँ पहुँचते ही उन्होंने अपने स्वप्न को टूटते पाया था. भारत पहुँचते ही उनका काल्पनिक संसार बिखर गया था.
यह उनके सपनों की आदर्श जगह नहीं है. यह वह जगह नहीं जहाँ के सब लोग उनके देश के लोगों से बेहतर हैं. उन्होंने यहाँ सड़कों पर गरीबी देखी, जेबकतरों के शिकार बने. टैक्सी ड्राईवरों ने उन्हें धोखा दिया और पाया कि यहाँ भी लोग मोटापे की बीमारी से पीड़ित हैं और बहुत से भारतीय इतने मोटे हैं कि पूरी तरह सामने झुक नहीं सकते. जिस गैस्टहाउस में वो रुके थे वहां के कमरे गंदे थे उनमें से अगरबत्तियों की वो खुश्बू नहीं आ रही थी जोकि उनके अपने घर में आती थी. ध्यान के दौरान सुनाई देने वाले कर्णप्रिय मन्त्रों की जगह यहाँ चारों तरफ शोर व्याप्त है. और हाँ, यहाँ ध्यान भी कोई नहीं करता!
वास्तविकता का पता चलने के बाद वे निराश, टूटा हुआ दिल लिए घर लौटते हैं. धरती पर उनकी आदर्श जगह का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है. भारतीय गुरुओं का आध्यात्मिक प्रचार उनके मन में भारत के सन्दर्भ में अवास्तविक अपेक्षाएं पैदा कर देता है. भारत एक उत्तेजक, महान, उत्साह, आनंद और रंगीनियों से भरा देश होगा लेकिन वह शांतिपूर्ण, पूरी तरह आध्यात्मिक कतई नहीं है और न वह वैसा है जैसी अपने देश में रहते हुए उन्होंने कल्पना की थी.
उनके भारत दौरों के बारे में, भारत को लेकर उनकी अपेक्षाओं और यहाँ हुए अनुभवों के बारे में बहुत से विदेशियों की बातें सुनने के बाद मेरी यह धारणा बनी और उन विचारों को मैंने यहाँ रखा है. और मैं जानता हूँ कि गलत अपेक्षाओं की यह स्थिति दोतरफा है: जब पश्चिमी लोग यहाँ आते हैं तब और जब भारतीय विदेश जाते हैं तब भी!
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