यौनिकता को स्वीकार करें – सिर्फ उसके बारे में प्रवचन देना ही पर्याप्त नहीं है! 14 सितंबर 2014

मेरा जीवन

मैंने कुछ दिन पहले आपको अपने कुछ नए मित्रों के विषय में बताया था, जिनसे मेरी मुलाकात सन 2006 में स्वीडन में नो माइंड फेस्टिवल के दौरान हुई थी और उत्सव के पश्चात् मैं उनके साथ स्टॉकहोम स्थित उनके घर पर रहा था। मैंने ज़िक्र किया था कि उत्सव में उन लोगों ने भी कार्यशालाएँ आयोजित की थीं, जिनमे वे यौनिकता को सहज रूप में स्वीकार करने पर ज़ोर देते थे और स्वाभाविक ही, जब मैं उनके यहाँ कुछ दिन रहा तो इस विषय पर मेरी भी उनसे चर्चा हुई थी।

वास्तव में मैंने पाया कि जो बात वे कह रहे थे उसे जीवन में भी उतार रहे थे; जिसका वे उपदेश दे रहे थे, उन भाषणों की सचाई को पूरी तरह अपने जीवन का हिस्सा बना रहे थे। उनके घर में प्रवेश करने वाला कोई भी व्यक्ति देख सकता था कि वे अपनी यौनिकता को लेकर शर्मिंदा नहीं थे: वहाँ नग्न पुरुष और महिलाओं की पेंटिंग्स देखी जा सकती थीं, जिनमें पुरुष और महिलाएँ एक-दूसरे को अपनी बाहों में कसकर जकड़े हुए दिखाए गए थे, खड़े लिंगों वाली पुरुष-मूर्तियाँ थीं और कलाकृतियाँ थीं, जिनमें महिला यौनांगों की खूबसूरती को विस्तार से चित्रित किया गया था।

ऐसे वातावरण में, स्वाभाविक ही, हमारे बीच सेक्स पर बातचीत होना लाज़िमी ही था। उत्सव में वह दम्पति मेरी कार्यशालाओं में आते रहे थे और यौन विषयों पर मेरा नज़रिया अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने यह भी सुन रखा था कि मैं पश्चिम में व्याप्त ‘तंत्र’ शब्द के अर्थ को ठीक नहीं समझता क्योंकि तंत्र का मूल सेक्स में निहित नहीं है। मुझे महसूस हुआ कि इसीलिए मेरे सामने इस शब्द का इस्तेमाल करते वक़्त वे अतिरिक्त सावधानी बरत रहे हैं बल्कि संभव है, उसकी परिभाषा बारे में उनके विचारों में तब्दीली भी आ गई हो।

हमारी बात का सारतत्व यह था कि यौनिकता पूरी तरह प्राकृतिक है लेकिन अधिकांश लोगों को यह तथ्य स्वीकार करने में दिक्कत पेश आती है। यह भी एक सचाई है कि दुनिया भर के समाजों ने सेक्स को एक तरह की कुंठा (taboo) बना दिया है, शर्म और अपराधबोध का कारण बना दिया है। कई सदियों के लम्बे समय में, विशेषकर धर्म ने इस गलत विचार को रूढ़ करने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाई है। दुर्भाग्य से आज भी, ऐसे समय में जब अधिकाधिक लोग धर्म को नकार रहे हैं और अपने निजी विचारों, नैतिकताओं और मूल्यों का अनुसरण कर रहे हैं, सेक्स, यौनिकता और अपने नग्न शरीर को लेकर शर्म और संकोच आज भी व्याप्त है।

हालाँकि स्केंडिनेवियन देशों में खुलापन कुछ अधिक है-इस बात को डेनमार्क में पहले भी मैं देख चुका था और अब इस बार स्वीडन में भी अनुभव किया- उस दम्पति ने मुझे बताया कि सामान्य रूप से सेक्स को लेकर झिझक, संकोच, अनुचित अपराधबोध और शर्म तथा दकियानूसी मूल्य कुछ अर्थों और मात्रा में वहाँ भी व्याप्त है।

इस तरह की खुली और सारगर्भित बातचीत बहुत सुखद रही और ऐसे समान विचारों वाले लोगों को मित्र बनाकर मुझे बड़ी ख़ुशी हुई!

%d bloggers like this:
Skip to toolbar