सप्ताहांत में वनविहार – 20 अप्रैल 2014

जब मैं सन 2006 में जर्मनी में था तो स्वाभाविक ही मैं कई लोगों से मिला, जो मेरी पिछली यात्राओं में मेरे घनिष्ठ मित्र बन चुके थे। उनमें से एक समूह के साथ मैं एक हॉलिडे-होम में पूरा सप्ताहांत बिताने के लिए राज़ी हो गया था। सिर्फ मज़े के लिए और हंसी-खुशी समय बिताने के लिए और मौके का लाभ उठाने के इरादे से। मैंने सोचा कि यह एक नया और रोचक अनुभव होगा।

मेरे साथ मेरे युवा मित्रों का समूह था, जो आध्यात्मिकता में रुचि रखता था। मैं उन्हें तब से जानता था, जब पिछले साल वे मेरे ध्यान-सत्र में शामिल हुए थे। उस समय भी, अपने आयोजक के घर पर हमने लंबी शामें एक साथ बातचीत करते हुए बिताई थीं। उनके बीच कुछ गाने-बजाने वाले संगीतज्ञ भी थे, जो भारतीय संगीत में भी रुचि रखते थे और जब मैं जर्मनी से बाहर रहता था तब भी उनके साथ ईमेल के जरिये संपर्क बना रहता था।

इस बार उन्होंने मेरे मोबाइल पर सूचना दी और हमने बात करके कार्यक्रम पक्का कर लिया। उनके किसी परिचित के पास वन में कोई केबिन उपलब्ध था और सप्ताहांत के लिए हमने वो केबिन किराये पर ले लिया था। वे मुझे ले जाने और वापस छोड़ने के लिए आने वाले थे और मैं उनका इंतज़ार कर रहा था।

तय सप्ताहांत पर वे मुझे लेने आए और लगभग दो घंटे की यात्रा के बाद हम एक वन में थे। सड़क अब एक बहुत धूल भरे, कच्चे और ऊबड़-खाबड़ रास्ते में तब्दील हो गई थी और हमें घने जंगल की ओर ले जा रही थी। आखिर एक जगह रास्ता बंद हो गया और हमें भी अपनी कारों से निकलकर आगे पैदल अपने गंतव्य तक पहुँचना था। तब मैंने देखा कि वे लोग अपनी पेटियों में क्या-क्या लेकर आए हैं: बर्तन, चम्मच, प्लेटें, सब्जियाँ, दाल, चावल, पानी, योग-मैट्स, कंबल और निश्चय ही अपने-अपने वाद्य-यंत्र भी। हम कुल 15 लोग थे और चार कारों में आए थे। सबने कुछ न कुछ उठाया और हम घने जंगल की ओर बढ़ चले।

गंतव्य ज़्यादा दूर नहीं था और हम एक छोटी सी खुली, साफ जगह पर आ गए, जहां एक तरफ एक लकड़ी का छोटा सा घर था और दूसरी तरफ आग जलाने का इंतज़ाम था। चारों तरफ खूबसूरती बिखरी पड़ी थी और जब हम अपना-अपना सामान उतारकर फुरसत हुए तो तुरंत आसपास के इलाके का मुआयना करने लगे।

जब सूरज नीचे आने लगा तो समूह के कुछ लोगों ने आग जला दी और कुछ दूसरे लोगों ने मिल-जुलकर एक स्टोव पर खाना पकाना शुरू किया। ऐसा भोजन अतुलनीय होता है-बाहर खुले आसमान के नीचे, जलती हुई आग के पास और डायनिंग-टेबल की औपचारिकताओं से मुक्त।

खाना खाने के बाद गाने-बजाने वालों संगीतज्ञों ने अपना कुछ संगीत सुनाया। हम सब गाए, गप-शप की और शाम का लुत्फ उठाया। युवा पुरुष और महिलाओं को कुछ और अंतरंग होने का मौका मिल गया और वे जोड़े बनाकर, आग से कुछ दूर, झुरमुटों में इधर-उधर बिखर गए।

कुछ लोग तो काफी रात होने तक वही पड़े रहे और मैं उस कुटिया में आकर, योग-मैट्स का कामचलाऊ बिछौना बनाकर सो गया। दो कमरों में से एक मैंने हथिया लिया था-बाकी के अधिकांश लोग बाहर खुले आसमान के नीचे सोते रहे।

सुबह, सूरज निकलने के बहुत बाद, हमने अपना सामान दोबारा पैक किया और इस तरह उस बेहतरीन शाम का पूरा आनंद लेकर हम सब वापस लौटे। मुझे वहाँ बहुत मज़ा आया-लेकिन फिर दूसरे दिन रात को एक सामान्य बिस्तर पर सोने का आनंद भी कुछ कम नहीं था!

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