भारत के विभिन्न इलाकों में एक सप्ताह का सफर – 19 जुलाई 2015

मेरा जीवन

मेरा पिछला सप्ताह लगातार यात्राओं का रहा! पहले काफी समय से मैं भारत में सिर्फ दिल्ली विमान तल से आश्रम और आश्रम से दिल्ली की यात्राएँ ही करता रहा था पर इस बार भारत में मैंने एक सप्ताह में कई हज़ार किलोमीटर का रास्ता तय किया!

सप्ताह की शुरुआत हुई सोमवार से, जब मैं सबेरे-सबेरे हवाई जहाज़ से गौहाटी के लिए निकल पड़ा। गौहाटी उत्तर-पूर्वी भारत के राज्य, असम का सबसे बड़ा शहर है और दिल्ली के पूर्व में 2000 किलोमीटर दूर स्थित है और जहाँ पहुँचने में हवाई जहाज़ से अढ़ाई घंटे लगते हैं। मैं वहाँ सबेरे पहुँचा और सात घंटे बाद, शाम तक वापस भी आ गया। क्यों? बाँस के लिए!

आपको पता होगा कि हम अपने आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी'ज़ की सजावट के लिए बाँस का इस्तेमाल कर रहे हैं। तो, बाँस विषयक अधिक जानकारी के लिए, उसके नमूने देखने और कुछ ऐसे लोगों से मिलने के लिए, जो बाँस का काम और उसका व्यापार करते हैं, मैंने एक दिन में पश्चिम से पूर्व पूरे देश को पार किया और वापस आया। स्वाभाविक ही, आश्रम वापस पहुँचते ही मुझे थकान महसूस होने लगी!

सोमवार की गतिविधियों की जानकारी लेते हुए, आराम करते हुए और अगले कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाते हुए दो दिन मैंने वृंदावन में बिताए। हमेशा की तरह तुरत-फुरत प्लान-क्योंकि गुरुवार को सबेरे रमोना, अपरा और मैं कार से उत्तर भारत की ओर, हिमालय की तरफ निकल पड़े।

हमारा लक्ष्य हिमालय की तराई में स्थित भारत के उत्तरी राज्य, उत्तराखंड का एक क़स्बा, कोटद्वार था। यह 300 किलोमीटर की सड़क यात्रा थी- छह घंटे में हम वहाँ पहुँच गए। बाँसों के काम के लिए प्रसिद्ध एक और स्थान, इस बार एक उपचार संयंत्र, जहाँ बाँसों को जलरोधक बनाया जाता है और उसे कीटाणुओं से बचाने के रासायनिक उपाय किए जाते हैं।

वहाँ लोगों से मुलाक़ात और चर्चा के बाद हमने हरिद्वार की ओर प्रस्थान किया, जो गंगा नदी के किनारे बसा शहर है और जहाँ हमने वह रात और अगली रात बिताने का निश्चय किया। लेकिन दूसरे दिन हमने आम पर्यटकों की तरह दृश्यावलोकन में समय नहीं बिताया। हमारे पास ऋषिकेश के कुछ पते थे, जहाँ जाकर हम कुछ देखना चाहते थे। पुनः बाँसों के लिए ही! उन्होंने बाँसों का उपयोग भवन निर्माण के लिए किया था और हम देखना चाहते थे कि उन्होंने यह किस तरह किया है- वास्तव में हम एक और जानकारी प्राप्त करना चाहते थे और कुछ हद तक, हम जो अपने रेस्तराँ में करने जा रहे हैं, उससे तुलना करना चाहते थे। तो हम वहाँ गए, गंगा पार की, विभिन्न लोगों से मुलाक़ात और चर्चा की और अंत में वापस होटल आ गए। वास्तव में यह छुट्टियाँ बिताने जैसा नहीं था लेकिन अपरा ने इस दौरे का पूरा-पूरा मज़ा लिया और भरपूर समय बिताया- उसे वहाँ स्वीमिंग पूल में तैरने का मौका मिला और बहुत सारे नूडल्स खाने को मिले!

कल शाम को हम वापस आश्रम आ गए- लेकिन मैं देर तक सो न सका: सुबह उठकर मैं एक और यात्रा पर निकल गया, इस बार 200 किलोमीटर दूर, हापुड़, जो हमारे इलाके में बाँसों की सबसे बड़ी मंडी है। वहाँ मुझे देश भर के कई तरह के बाँस देखने का मौका मिला- और जिस तरह का बाँस हमें चाहिए था, वहाँ मिल भी गया।

यह सप्ताह काफी सफल रहा और मैं अब बहुत थक गया हूँ लेकिन मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा है। मुझे लग रहा है जैसे मैं अभी भी कार में ही हूँ, यात्रा कर रहा हूँ और कल मुझे धीरे-धीरे अपने योगासन करने होंगे, विशेष रूप से अपनी मांसपेशियों के लिए आवश्यक योगासन- लेकिन कुल मिलाकर सब कुछ बड़ा अच्छा रहा!

आप पूछेंगे, यह सब हमें खुद क्यों करना पड़ा! यह मैं आपको बाद में कभी बताऊँगा कि क्यों मुझे खुद देश भर में घूम-घूमकर इस काम को इस तरह सम्पन्न करना पड़ा।

यहाँ आप हमारी हरिद्वार यात्रा के कुछ चित्र देख सकते हैं

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