जर्मनी की यादगार हवाई यात्रा के बाद, जिसके बारे में पिछले सप्ताह मैंने आपको बताया था, जर्मनी में मेरा पहला पड़ाव था कोलोन, जहां मुझे योग शिक्षक प्रशिक्षण की शुरुआत करनी थी। हम यह प्रशिक्षण शिविर कोलोन विश्वविद्यालय के सहयोग से आयोजित करने वाले थे। शिविर के दौरान इस हफ्ते में मैंने वह चीज़ देखी जो दुनिया भर के दौरे करने के बाद भी न तो पहले कभी नहीं देखी थी और न ही बाद में आज तक देखी है: एक ऐसा संडास जो एक साथ दो लोगों के उपयोग के लिए लिए था।
हमने कोलोन के विशाल सेमिनार भवन, थालामुस में कमरे बुक करवाए थे। जब एक लंबे व्याख्यान के बाद मुझे पेशाब लगी तो मैं संकेत पट्टिकाओं को देखता हुआ प्रसाधन की ओर गया और दरवाजा खोलकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। वह एक विशाल स्नानघर जैसा कमरा था, जिसमें एक बड़ा-सा वाशबेसिन था और दो टोयलेट सीटें थीं।
मैं तब तक पहले भी कई बार जर्मनी और पश्चिमी देशों के कई शहरों के दौरे कर चुका था और कई बार प्रसाधन में टोयलेट सीट के अलावा एक बिडे (bidet) देखा है, जिसे पाखाना करने के बाद खुद को साफ करने के उपयोग में लाया जाता है। लेकिन नहीं, यहाँ एक-दूसरे के अगल-बगल एक जैसी दो टोयलेट सीटें मौजूद थीं।
पेशाब के तनाव से निपटकर जब मैं सेमिनार-रूम में वापस आया तब यशेंदु योगासनों की कक्षा ले रहा था। जब उसकी कक्षा समाप्त हुई, दोपहर के खाने का वक़्त हो चुका था। जब यशेंदु और मुझे दोनों को एक साथ टोयलेट उपयोग करने की आवश्यकता महसूस हुई तो मैं उसे खींचता हुआ उसी टोयलेट की तरफ अपने साथ ले गया, जिसे मैंने कुछ देर पहले खोजा था। और हम दोनों ने एक साथ संयुक्त पाखाना सत्र का लुत्फ उठाया! हम दोनों एक-दूसरे के साथ बहुत खुले हुए हैं और हम दोनों वहाँ मज़े में गप्पबाजी करते रहे।
जब हम निपटकर वापस योग-छात्रों से मिले तो उनमें से कुछ लोगों से बात होने लगी और हमने उन्हें मेरी टॉयलेट-खोज के बारे में बताया। सप्ताहांत के ऐसे कार्यक्रमों के दौरान मैं और यशेंदु बहुत व्यस्त रहते हैं और हमें आपस में भी ज़्यादा बात करने का मौक़ा नहीं मिलता। तो हम इस टॉयलेट वाले समय का इस्तेमाल आपसी चर्चा हेतु कर लिया करते थे- वाकई यह विचार मुझे बड़ा अच्छा लगा!
इस बातचीत के दौरान मुझे ध्यान आया कि भारत में इसे बिल्कुल अनूठा नहीं माना जाएगा, कम से कम महिलाओं के संदर्भ में। इस आवश्यक प्राकृतिक बुलावे पर सबेरे-सबेरे आप बहुत सी महिलाओं को एक साथ, हाथों में पानी का लोटा लिए, खेतों की तरफ जाता हुआ पाएंगे। वे समूहों में निकलती हैं, सामूहिक रूप से गोल घेरे में बैठ जाती हैं और पूरा सम्मेलन आयोजित करते हुए अपना काम निपटाती हैं। वे एक-दूसरे को पिछले दिन का पूरा हाल-अहवाल सुनाती हैं और शायद शहर की सारी चर्चा वहीं सम्पन्न होती है।
मैंने अपने विद्यार्थियों को अपने देश की महिलाओं की इस आदत के बारे में बताया और जब उन्होंने हमसे कहा कि यह पश्चिमी देशों में भी महिलाओं की सामान्य आदतों में शुमार है तो हम सब खूब हँसे। वहाँ भी वे एक साथ टॉयलेट जाती हैं-पहले एक, फिर दूसरी और फिर सब मिलकर बातें करती हैं और अपनी-अपनी भावनाएँ व्यक्त करती हैं। वे यही समझती हैं कि टॉयलेट इसी काम के लिए बने हैं-क्योंकि इसके लिए महिलाएं हमेशा साथ ही निकलती हैं!
वाकई मैंने सोचा कि यह एक अच्छा तरीका हो सकता है और उसे हर जगह कार्यान्वित किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से मैंने इसे आज तक और कहीं नहीं देखा।
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