मुफ्त आध्यात्मिक विवाह कराइए: बस गुरु की दुकान से महँगे कपड़े खरीदने होंगे – 9 जून 2013

मेरा जीवन

मैंने आपको एक आयरिश महिला के बारे में बताया था जिससे मेरी मुलाक़ात डब्लिन में सन 2005 में हुई थी और जिसे वर्षों की खोज के बाद अंततः एक उपयुक्त साथी मिल गया था। मैं खुश था कि आखिर उसकी बदहवासी दूर हुई थी और उसने ‘कोई अपना’ प्राप्त कर लिया था। हालांकि उसकी असुरक्षा और उसके पति की कुछ समस्याएँ उन्हें परेशानियों में डालते ही रहते थे। गुरु बनने के लिए और उसकी जिम्मेदारियों और उसके निर्णयों में साझा होने के लिए मेरे मना करने के बाद वह कुछ दूसरे गुरुओं की शरण लेती ही रहती थी। यह अच्छा हुआ कि वह मेरे संपर्क में बनी रही और बीच-बीच में हम आपस में हल्की-फुल्की, दोस्ताना बातें कर लिया करते थे। स्वाभाविक ही मैं बहुत खुश हुआ था जब उसने बताया कि वह और उसका साथी विवाह बंधन में बंध गए हैं। लेकिन जब मुझे पता चला कि उनका विवाह किन परिस्थितियों में और किस तरीके से हुआ है, तो मैं सोच में पड़ गया।

महिला और उसके साथी के सम्बन्धों में विवाह से पहले कई बार बीच-बीच में उतार-चढ़ाव आते रहते थे। एक बार जब उनकी प्रिय गुरु आयरलैंड आयी हुई थी, उनका प्रेम अपने चरम पर था और उन्होंने तय किया कि इस भारतीय गुरु द्वारा ही अपना विवाह सम्पन्न कराया जाए।

पता नहीं कहाँ से यह विचार उनके मन में आया; हो सकता है, गुरु के किसी शिष्य ने इस संभावना के बारे में उन्हें बताया हो। उस गुरु द्वारा दी जा रही बहुत सी सेवाओं में से यह भी एक थी। यहाँ तक कि विवाह संस्कार कराने की गुरु कोई फीस भी नहीं लेते थे और न ही दक्षिणा वगैरह स्वीकार करते थे!

अब आप सोच रहे होंगे और ठीक ही सोच रहे होंगे कि मैं इस आध्यात्मिक गुरु द्वारा दो प्रेमियों के फ्री में कराए गए विवाह को ऐसी शक की निगाह से क्यों देख रहा हूँ जब कि उसमें रुपए-पैसे का कोई मामला भी नहीं था। बात यह है कि रुपए-पैसे मामला था और काफी बड़ी रकम का मामला था! उस दंपति से गुरु ने विवाह संस्कार सम्पन्न कराने का तो कोई पैसा नहीं लिया मगर समारोह में लगने वाली आवश्यक वस्तुओं की खरीद उन्हें उस गुरु की संस्था से ही करनी पड़ी, यहाँ तक कि विवाह के अवसर पर पहने जाने वाले वर और वधू के वस्त्र भी उन्हीं की दुकान से खरीदने पड़े। ये सारी वस्तुएँ गुरु द्वारा अभिमंत्रित की गई थीं और कई वस्त्रों को गुरु द्वारा पहले पहना जा चुका था। कुछ अति-अंधभक्त शिष्य उन वस्त्रों को पवित्र मानते थे और समझा जाता था कि उन्हें पहनना सौभाग्य की बात होती है।

इस तरह उन्होंने गुरु की उतरन खरीदकर और उसे पहनकर अपना आध्यात्मिक विवाह बाकायदा समारोह पूर्वक उस गुरु के हाथों सम्पन्न कराया मगर उन वस्त्रों पर, मेरे विचार से, कुछ ज़्यादा ही, लगभग अकल्पनीय धन, खर्च कर दिया था। लेकिन ठहरिए, सिर्फ विवाह के वस्त्रों पर किया गया खर्च ही मुझे अनोखा नहीं लगा क्योंकि वैसे भी विवाह के वस्त्र महंगे होते ही हैं। दरअसल मुझे अजीबोगरीब लगी विवाह के लिए गुरु की दुकान से ही सारा सामान खरीदने की शर्त। यह बात तो विवाह कराने की फीस अदा करने की तरह ही थी! आखिर दोनों में फर्क ही क्या था?

निस्संदेह मैंने उस नव-विवाहित जोड़े से अपने ये विचार नहीं कहे। बस मुझे लगा कि एक और आधुनिक गुरु का पता चला जो अपने पश्चिमी शिष्यों को यह धोखा देकर कि वह मोह-माया से निर्लिप्त है, पैसा कमाने में लगा हुआ है। ये पश्चिमी शिष्य उसका पाखंड समझ तो पाते ही नहीं, बल्कि खुश होते हैं! खैर मैं मनाता रहा कि जो हुआ सो हुआ, अब यह महिला, जो समय गुजरने के साथ मेरी अच्छी मित्र बन चुकी थी, अपने विवाह में खुश रहे।

लेकिन मैंने उसकी असुरक्षा के बारे में आपसे ज़िक्र किया था, न? हाँ, तो संक्षेप में यह कि उनके लिए इतना ही काफी नहीं था। अपना आधात्मिक विवाह तो उन्होंने करवा लिया मगर उनका अलग होना और फिर एक हो जाना जारी रहा। और आखिर में उन्होंने एक बार और उसे दोहराने का विचार किया; इस बार ज़्यादा परंपरागत तरीके से। वे कैथोलिक चर्च गए और वहाँ अपना विवाह पुनः सम्पन्न कराया। इस बार सारे परिवार की उपस्थिति में, दुल्हन सफ़ेद वस्त्रों में और दूल्हा परंपरागत सूट (टक्सिडो) में।

और मैं आज की डायरी अंग्रेज़ी की इस कहावत के साथ समाप्त करूंगा: और वे जीवन भर सुख से रहे क्योंकि अंत भला तो सब भला!

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