शोक के समय एक मौन सांत्वना – 7 जुलाई 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

राधाष्टमी समारोह के तुरंत बाद, 2005 में मैं पुनः यूरोप दौर पर निकल गया था। मेरी यात्रा में कई पड़ाव आए और मैं जर्मनी भी वापस आया था। मगर इस यात्रा के दौरान मैंने कुछ वक़्त बिल्कुल एकांत और मौन में बिताने का निर्णय किया था। मैं पहले भी ऐसा कर चुका था और हर बार वह मेरे लिए एक सुकून से भरा अनुभव हुआ करता था।

दरअसल मैं पूरे प्रवास में मौन रहने वाला नहीं था। लगातार, सारा दिन भी नहीं। मैं कुछ घंटे, शायद छह या आठ घंटे, इसके लिए नियत कर लेता था, और उस दौरान मौन रहता था। वैसे मैं रोज़मर्रा के कार्य यथावत निपटाता चलता था, बस बात नहीं करता था। मैंने अपने इस निर्णय से अपने आयोजकों को अवगत करा दिया था और हालांकि उनके लिए यह एक नई बात थी, वे समझ गए कि मैं ऐसा क्यों करना चाहता हूँ। महज अपनी इंद्रियों को सबसे अलग करके अंतर्मुखी होने की यह प्रक्रिया थी जिससे बात करने से होने वाले ऊर्जा के अपव्यय से बचा जा सके।

तो मैं कुछ समय के लिए मौन रहता था और सबने उसे सहजता के साथ स्वीकार कर लिया। बल्कि लोगों ने उसके महत्व को समझा भी और कुछ लोगों ने मुझे देखकर अंतर्मुखी होने के इस उपाय को स्वयं आजमाने का प्रयास भी किया। इस दौरान मैं सिर्फ आँखों से अपनी बात कहता था, संवाद के किसी और तरीके का इस्तेमाल नहीं करता था। चिह्न बनाकर या लिखकर भी नहीं- वैसा करने से इस क्रिया से अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं होता। इस तरह मैं किसी तरह के संवाद से आम तौर पर दूर ही रहता था।

मैं नहीं जानता कि यह कैसे हुआ मगर एक दिन मैंने अचानक देखा कि मेरा फोन ब्लिंक कर रहा है। उस पर एक संदेश प्राप्त हुआ था। मैंने उसे उठाया और वह बुरी खबर पढ़ी: कई वर्षों के मेरे मित्र ने (मेरा पहला जर्मन मित्र, जो ल्युनेबर्ग में डॉक्टर था) दो शब्दों में सूचित किया था कि उसके पिताजी का देहांत हो गया है।

स्वाभाविक ही इस सूचना ने मुझे दुखी कर दिया। इस बात की चिंता भी थी कि मेरा मित्र किस तरह इस सदमे को बर्दाश्त कर रहा होगा। मैं स्टुटगार्ट में था जो वहाँ से कुछ सौ किलोमीटर दूर था लेकिन ल्युनेबर्ग जाने का मेरा कार्यक्रम पहले से तय था और कुछ सप्ताह बाद हम आपस में मिलने वाले थे। लेकिन, अभी, तुरंत अपनी ओर से सांत्वना का कोई चिह्न उस तक पहुंचाना आवश्यक था।

मैंने उसे एक ब्लैंक संदेश भेज दिया।

मेरा मित्र जानता था कि मैंने अभी मौन-व्रत लिया हुआ है। वह अपने मृत पिता के पास बैठा हुआ था कि उसे मेरा संदेश मिला। यह सोचते हुए कि उसमें कोई सामान्य सा संदेश होगा, वह फोन पर नज़र दौड़ाने लगा। खाली जगह। मौन। आलिंगन, प्रेम, सब कुछ उस खाली जगह में व्यक्त हो रहा था। ऐसे दुखदाई समय में भी उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।…….. "सिर्फ और सिर्फ बालेंदु ही ऐसा कर सकता है!"…. उसने सोचा। जब भी इस दुखद घटना की चर्चा होती है, यह बताना वह नहीं भूलता।