सन 2006 में मुझे यूरोप की बहुत सी जगहों की यात्रा करने का और बहुत से लोगों को जानने का मौका मिला। एक आयोजक से मिलने के बाद मुझे लगा कि मैं ऐसे लोगों से पहले भी मिल चुका हूँ और आने वाले वर्षों में और भी कई ऐसे लोगों से मिलता रहूँगा: ऐसे व्यक्ति, जिनके पास बहुत धन-दौलत है मगर मैं जिन्हें दरिद्र ही कहूँगा!
मेरा यह आयोजक, जो पहले मेरे दो कार्यक्रमों में शामिल हुआ था और फिर अपने घर में मेरे और यशेंदु की कार्यशालाएँ और योग-सत्र आयोजित करना चाहता था, एक चालीस साल का तलाकशुदा अकेला व्यक्ति था। उसका तलाक हो चुका था और बच्चे भी नहीं थे। उस समय तक वह किसी सम्बन्ध में बंधा हुआ भी नहीं था। उसके पास सिर्फ एक चीज़ थी: बहुत सा पैसा!
मजबूरन अपनी भूतपूर्व पत्नी को अच्छी-खासी रकम देने के बाद भी वह एक बड़े, आलीशान मकान में रहता था, एक महँगी कार की सवारी करता था और इतनी अतिरिक्त दौलत उसके पास बची हुई थी कि उसके दैनिक खर्च, ऐयाशियाँ और मनमर्ज़ी के दूसरे खर्च उनसे निकल रहे थे। वह किसी बड़ी कंपनी में प्रबंधन के वरिष्ठ पद पर आसीन था और बड़ी मात्रा में उसके पास पुश्तैनी धन-दौलत भी थी। लेकिन उसके साथ रहते हुए मुझे महसूस हुआ कि ज़्यादा धन-दौलत भी एक समस्या ही बन जाती है: वह उसका उपयोग नहीं कर पाता था, उसका मज़ा नहीं ले पाता था! एक सीमा के बाद उसकी कंजूसी की अति देखकर मैं यह सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर यह व्यक्ति पैसे के वास्तविक महत्व को समझता भी है या नहीं।
यह व्यक्ति छोटे-मोटे खर्चों पर भी बिदकता था। जब खरीदारी करने बाज़ार जाता तो एक से एक सामानों से भरी आलमारियों के सामने घंटों खड़ा रहता और चुनकर सबसे सस्ती चीज़ उठाता-खाने का तेल हो, पानी, चीज़, मक्खन कुछ भी हो-भले ही वह घटिया क्यों न हो। जब भी हम किसी भी बात पर चर्चा करते, उस पर होने वाला संभावित खर्च उसके मन में सर्वोपरि होता। यहाँ तक कि सफ़र में जब कभी उसे टॉयलेट की ज़रुरत महसूस होती वह लम्बी दूरी तय करता मगर किसी पेड टॉयलेट के लिए पैसे खर्च करना उसे मंज़ूर नहीं था! हर बात, हर दैनिक व्यवहार में रुपया उसके सोच का सबसे अहम् मुद्दा होता था!
दरअसल मैं इसे बिना अचरज और कोफ्त के स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था और आखिर उसकी इस आदत के बारे में मैंने पूछ ही लिया। लेकिन उसके लिए यह ऐसी आदत बन चुकी थी कि वह इस तरह सोच ही नहीं पा रहा था, उसे समझने में मुश्किल हो रही थी कि मैं उसे क्या बताना चाह रहा हूँ।
मैं नहीं समझता कि पैसा लोगों को धनवान बनाता है। धनी होने के लिए आपके दिल में प्रेम होना चाहिए, सुंदर विचार होने चाहिए, संवेदनशील मन होना चाहिए, स्नेहिल भावनाएँ होनी चाहिए! और दुर्भाग्य से अगर आप हर चीज़ को पैसे से जोड़ लेते हैं तो आप प्रेम का न तो अनुभव कर सकते हैं और न ही अपना प्रेम प्रदर्शित कर सकते हैं!
दरअसल वह एक कंगाल व्यक्ति था। मैंने उसके साथ अपनी थोड़ी सी दौलत साझा करने की कोशिश की और मुझे लगता है, उसने भी उसे महसूस किया होगा!
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