एक डॉक्टर और एक कलाकार – बचपन के दोस्त की मदद – 29 जून 2014

अपने 2006 के विदेश दौरे में मैं न सिर्फ नई जगहों में गया बल्कि अपने उन आयोजकों और मित्रों के साथ उनके घरों में भी रहा, जिनके यहाँ मैं अपनी पिछली यात्राओं के दौरान भी नियमित रूप से रहता आया था। उनमें से एक जर्मन मित्र, जो डॉक्टर और मनश्चिकित्सक था और लुनेबर्ग नामक स्थान में रहता था। जब मैं उसके साथ रह रहा था, मुझे उसके उदार और मददगार स्वभाव को एक बार फिर करीब से देखने का अवसर मिला। दूसरों की मदद करने की आदत को जिस तरह उसने अपनी ज़िन्दगी में उतारा था उसकी प्रशंसा किए बगैर मैं नहीं रह सका।

उसकी एक बचपन की मित्र थी, एक लड़की, जो उसके पड़ोस में रहकर ही बड़ी हुई थी और एक किशोर के रूप में वह उसके साथ खेलता रहा था। एक तरफ उसने कॉलेज जाना शुरू किया, पढ़ाई की और पहले डॉक्टर और फिर एक मनश्चिकित्सक बना और दूसरी तरफ उसकी मित्र ने दूसरा रास्ता चुना: वह एक कलाकार बन गई, अगर और स्पष्ट करना हो तो, एक पेंटर। जैसा कि अधिकतर लोग जानते होंगे, कला आर्थिक रूप से उतना प्रतिफल देती नहीं है जितना कि डॉक्टरी का पेशा और इसलिए वह महिला बड़ी मुश्किल से गुज़र-बसर के लायक कमाने के संघर्ष में जुटी हुई थी, जबकि हमारा मित्र जीवन में एक सफल डॉक्टर के रूप में स्थिर हो रहा था और उसका भविष्य सुरक्षित था।

कलाकारों का जीवन कैसा होता है, आप जानते हैं। उनमें एक तरह का जुनून होता है और जबकि अपने काम में वे निमग्न रहते हैं, उसमें उन्हें ख़ुशी मिलती है मगर उससे उन्हें गुज़र-बसर करने लायक आमदनी नहीं हो पाती। दूसरे बहुत से कलाकारों की तरह वह महिला भी सरकार की ओर से थोड़ी-बहुत मदद पाती थी, मासिक अर्थ-वृत्ति, जिससे उसका खर्च बड़ी मुश्किल से निकल पाता था। उसे अपनी पेंटिंग्ज़ बेचने में सफलता नहीं मिल पाती थी- दो पेंटिंग्ज़ जो उसकी बिकी थीं, वह मेरे उसी डॉक्टर मित्र द्वारा खरीदी गई थीं!

जब भी मैं एक सप्ताह के लिए उसके क्लीनिक में आता था तो देखता अक्सर वह महिला उससे पैसे माँगकर ले जाती है। नहीं, भीख नहीं। वह हमेशा जोर देकर कहती, "कुछ उधार दे दो, जब मेरी पेंटिंग्ज़ बिकेंगी, वापस कर दूँगी!"

निश्चय ही वह समय कभी नहीं आया। इसका जो ईनाम उसे मिला वह था सड़क किनारे खिले फूलों का गुलदस्ता। फिर भी मेरे मित्र ने मुझसे कहा, "पिछले तीस सालों में हर दूसरे हफ्ते मैं उसे कुछ न कुछ देता रहा हूँ और मैंने उसका कोई हिसाब भी नहीं रखा है कि कुल कितनी रकम मैं उसे दे चुका हूँ क्योंकि मैं उससे एक दमड़ी भी वापस पाने की अपेक्षा नहीं रखता। मैं उसके चेहरे की हँसी और प्रेम देखकर बहुत खुश होता हूँ।" और उसने यह भी जोड़ा: पैसे के रूप में मैं भी उसे प्रेम ही देता हूँ।

उसका रवैया देखकर और उसकी बातें सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। उसका कहना था कि उसकी मदद करके वह गरीब नहीं हो जाता लेकिन इतना जानता है कि उसे रुपयों की सख्त ज़रुरत होती है। तो यहाँ-वहाँ से मदद मिल जाने पर वह अपना गुज़र कर पाती है और साथ ही उसे अपने स्वप्न को जीने का अवसर भी प्राप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में आप उसकी मदद क्यों नहीं करना चाहेंगे?

यही एक कारण है कि मैं कहता हूँ कि मेरे मित्र ने एक विशाल ह्रदय पाया है। और यह एक उदहारण है कि कैसे आप लोकसेवा के संकल्प को अपने दैनिक जीवन में उतार सकते हैं!

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