एक प्रतियोगिता, जो मुझे अच्छी नहीं लगी, भले ही मैंने उसे जीत लिया था – 20 जुलाई 2014

मेरा जीवन

आज मैं आपको सन 2006 में कोपेनहेगन में दिए गए अपने व्याख्यान के बारे में बताना चाहता हूँ। हर तरह से वह एक अनोखा व्याख्यान रहा। क्यों? आगे बताता हूँ।

कोपेनहेगन में मेरा एक दोस्त था, जिसके बारे में शायद मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ। वह एक लेखक है; दार्शनिक की मानिंद वाकई एक दिलचस्प व्यक्ति। उसने मुझे 2006 में दोबारा अपने यहाँ आने का न्योता दिया और वही उस बार मेरे कार्यक्रम आयोजित करने वाला था। आयोजक के अतिरिक्त वह मेरा मित्र भी था और कार्यक्रमों के बीच मैं उसके साथ एक मित्रतापूर्ण समय गुज़ारने की प्रत्याशा में था।

मैं सबेरे सबेरे कोपेनहेगन आ गया और उसके घर, जहाँ मैं कुछ दिन ठहरने वाला भी था, पहुँचने पर उसने मुझे मेरे कार्यक्रमों की रूपरेखा बयान की। सूची में सबसे पहला स्थान मेरे उसी व्याख्यान का था, जिसका आयोजन उसी दिन होना था और उसने उसके विषय की मूल बातों को स्पष्ट करते हुए कहा: यह व्याख्यान कुछ अनोखा होगा! मैंने पूछा कि ‘अनोखा’ से उसका क्या मतलब है तो उसने विस्तार से समझाना शुरू किया:

उसकी योजना के मुताबिक वहाँ अकेला मैं व्याख्यान नहीं देने वाला था बल्कि वह खुद और हम दोनों का एक और मित्र भी मेरे साथ शामिल रहने वाले थे। हम दोनों के इस साझा मित्र का लोगों के साथ सीधा संपर्क था और वह उनकी शारीरिक समस्याओं पर काम किया करता था। हम तीनों को एक ही विषय पर बोलना था और उसके बाद श्रोताओं को, जोकि इस आयोजन में पैसा खर्च करके हम तीन भिन्न व्यक्तियों को सुनने आने वाले थे, यह निर्णय करना था कि किसका व्याख्यान सबसे अच्छा रहा।

मैं पूरी तरह हतप्रभ रह गया। कार्यक्रम शुरू होने में कुछ घंटे ही बाकी थे और मैंने व्याख्यानों के इस तरह के किसी आयोजन के बारे में सुना तक नहीं था। मैं आज तक ऐसी किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं बना था और मेरे अन्दर किसी भाषण प्रतियोगिता में विजयी होने का न तो कोई जज़्बा था और न ही कोई महत्वाकांक्षा थी! ईमानदारी की बात यह कि यह विचार मुझे कतई पसंद नहीं आ रहा था। अपने दोस्तों के विरुद्ध प्रतियोगिता में शामिल होना मुझे अजीब सा लग रहा था! खैर, सारे इंतज़ाम हो चुके थे और मैंने सोचा, चलो पहली बार इस तरह का अनुभव प्राप्त होगा। एक नया, अलग सा अनुभव-अपनी तरफ से अपन अच्छे से अच्छा कुछ करते हैं!

जैसी योजना थी, सबके भाषण हुए। मेरे मित्र ने श्रोताओं के पास हम तीन वक्ताओं के नामों की पर्ची पहुँचा दी, जिस पर भाषणों की समाप्ति पर उन्हें हर वक्ता को अंक प्रदान करने थे। फिर एक के बाद एक हम तीनों ने एक निर्धारित विषय पर-याद नहीं, विषय क्या था-भाषण दिए और श्रोताओं को सोच-समझकर अंक देने के लिए कुछ वक़्त दिया गया। फिर सारे श्रोताओं से पर्चियां वापस ली गईं और अंकों का हिसाब लगाया गया-और फिर वह क्षण भी आ गया जब नतीजे घोषित किए जाने थे:

प्रतियोगिता में मैं विजयी रहा था, दूसरे क्रम पर हमारा वह साझा मित्र था और आयोजक स्वयं तीसरे और अंतिम स्थान पर रहा।

मुझे कोई अचरज नहीं था-आखिर यह मेरा पेशा था! जहाँ तक बाकी दोनों का सवाल था, मुझे लगता है श्रोताओं ने अपनी निजी पसंद के अनुसार अंक दिए होंगे। हमारा वह साझा मित्र ज्ञान का भण्डार ही था और हालाँकि वह पेशावर वक्ता नहीं था, वह सारा दिन लोगों के साथ संपर्क रखे हुए था। वह भी एक लेखक था और जानता था कि अपने विचारों को शब्दों में कैसे व्यक्त किया जाता है।

सारे आयोजन पर हम हँसते रहे, उस पर हल्की-फुलकी बातें करते रहे और श्रोताओं को भी यह अच्छा लगा कि हम सभी ने प्रतियोगिता को खेल की तरह लिया-कम से कम यह ज़ाहिर करते रहे कि हम उसे खेल की तरह ले रहे हैं। मगर पूरे समय मुझे लगता रहा कि मेरे मित्र का अहं आहत हुआ है! उसके चेहरे पर मुस्कान थी, वह भरसक अपने आप पर हँसने का नाटक कर रहा था लेकिन उससे ज़्यादा कुछ न कुछ उसके भीतर घटित हो रहा था! मैं उसे अच्छी तरह जानता था और मुझे लग रहा था कि उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रतियोगिता में वह तीसरे और अंतिम स्थान पर रहेगा।

वह पूरे कार्यक्रम का पूरा आनंद नहीं ले सका-अन्यथा मैं समझता हूँ कि यह विचार उतना बुरा भी नहीं था और उसका भरपूर मज़ा लिया जा सकता था!

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