वैश्वीकरण के खतरे – जब सारी अच्छी चीज़ें निर्यात कर दी जाती हैं! 10 जुलाई 2014

कल मैंने आपको बताया था कि कैनेरी द्वीप पर हमारे लिए अच्छे टमाटर प्राप्त करना मुश्किल हो गया था-बल्कि कहें, असंभव हो गया था क्योंकि वहाँ पैदा होने वाले सबसे बेहतरीन टमाटर अक्सर दूसरे देशों को निर्यात कर दिए जाते हैं। लेकिन यह समस्या सिर्फ इन द्वीप-समूहों या सिर्फ स्पेन की नहीं है! यह एक विश्वव्यापी समस्या है, एक अलाभकारी व्यवस्था, एक बहुत बड़ा खतरा, जिसने वैश्वीकरण के चलते दुनिया भर को अपनी जकड़ में ले लिया है।

ठीक इसी समस्या का सामना हम भारत में भी कर रहे हैं! दुनिया में आम का सबसे अधिक उत्पादन भारत में होता है। फिर भी देशवासियों की हमेशा यह शिकायत रहती है कि उन्हें अपने ही देश में पैदा होने वाले सबसे बेहतरीन आम देखने तक को नहीं मिलते! पेड़ों पर से उतारकर उन्हें सीधे विदेशी बाज़ारों में बिकने के लिए रवाना कर दिया जाता है।

चावल पर भी यही बात लागू होती है! विदेश में रहते हुए हर व्यक्ति भारतीय चावलों की गुणवत्ता जानते हैं और जब आप यहाँ खरीदे गए चावल घर पर पकाते हैं तो सारी रसोई गमक उठती है- लेकिन भारत में यह चावल मुश्किल से मिल पाता है!

भारत में चाय और कॉफ़ी भी बहुत पैदा होती है! आसाम और दार्जिलिंग की चाय दुनिया भर में मशहूर है लेकिन कल ही किसी ने मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए बताया कि भारत की सबसे उत्कृष्ट चाय तो सीधे निर्यात कर दी जाती है! उसी व्यक्ति ने आश्चर्य व्यक्त किया कि आखिर भारत में हर कोई इंस्टेंट कॉफ़ी क्यों पीता है-सारी असली, शुद्ध कॉफी कहाँ गायब हो जाती है?

यह सब पैसे का खेल है। पश्चिमी देश कुछ सामानों की ज़्यादा कीमत अदा करते हैं लिहाजा उन चीजों को निर्यात कर दिया जाता है भले ही उन्हें पैदा करने वाले ही उन सामानों से महरूम हो जाएँ। यह सामान उन्हें कम मात्रा में ही उपलब्ध हो पाता है और जो होता है, वह भी कम गुणवत्ता वाला, घटिया होता है। इसमें लाभांश तो बहुत अधिक है मगर देशवासियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है और इसके अलावा इस व्यवस्था में उन सभी बातों की उपेक्षा की जाती है जिसे आप संवेदनशीलता, मानवता और सहज-बुद्धि कहते हैं!

सिर्फ आप अफ्रीका की हालत पर नज़र दौड़ा लीजिए! विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी, नेस्ले ने अफ्रीका के तमाम पानी के स्रोत खरीद लिए हैं और वहाँ के गाँवों को और स्थानीय लोगों को उनके खेतों के लिए पानी मिलना मुश्किल हो रहा है! उनके पानी का निजीकरण कर दिया गया है और अब ये कम्पनियाँ उसे बोतलों में भरती हैं और दुनिया भर के बाजारों में बेचकर अनाप-शनाप मुनाफा कमाती हैं। या फिर उन्हीं देशों में महँगे दामों में बेचकर मुनाफा कमाती हैं-उन्हीं लोगों को बेचकर, जिन्हें पहले पानी मुफ्त उपलब्ध था! और इस बात का तो सवाल ही नहीं उठता कि वे उन लोगों को, जो उन्हीं की फैक्ट्रियों में काम करते हैं, पर्याप्त मजदूरी अदा करते होंगे कि वे उनका बोतलबंद पानी पीने के बाद अपने परिवार का भरण-पोषण भी ठीक तरह से कर सकें! इसलिए अब स्थानीय लोगों को हैण्ड-पम्प से पानी भरने बहुत दूर जाना पड़ता है और उसे किफ़ायत के साथ इस्तेमाल करना पड़ता है कि दिन भर के लिए पर्याप्त पानी घर में हर वक़्त उपलब्ध रहे।

पानी। चावल। फल। बहुत साधारण, रोज़मर्रा की चीजें! वैश्वीकरण के चलते हर कोई चाहता है कि अच्छी से अच्छी चीजें उसे हर वक़्त, उसके घर पर उपलब्ध हों। क्या हम पल भर ठहरकर यह विचार नहीं कर सकते कि भले ही यह सब हमारे लिए बड़ा सुविधाजनक हो मगर इसका हमारी धरती पर विनाशकारी असर होता है? कि लोग भूखे मर रहे हैं और उनके पास पीने का पानी नहीं है क्योंकि दूसरे कुछ लोगों को सिर्फ अपनी सुविधा और आराम की चिंता है या सिर्फ इस बात की कि ज़्यादा से ज़्यादा लाभांश कैसे कमाया जाए, अमीर कैसे हुआ जाए!

आप कहेंगे कि यह तो दुनिया भर की विशाल और ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मामला है, हम क्या कर सकते हैं? लेकिन नहीं, आप बहुत कुछ कर सकते हैं!

पीछे मुड़कर देखिए और विचार कीजिए कि आपका भोजन कहाँ से प्राप्त होता है! जब भी संभव हो, स्थानीय सब्जियाँ और फल खरीदें; जैविक (आर्गेनिक) खेती या जैविक पैदावार का लेबल देखकर ही चीजें खरीदें; हमेशा न्यायपूर्ण लेन-देन (व्यापार) सुनिश्चित करें भले ही आपको कुछ महँगा खरीदना पड़े। अपने आप पर और अपने उपभोग पर नज़र रखें।

अगर हम इतना भर कर सकें तो हम सब मिल-जुलकर इस संसार को अच्छी रहने लायक जगह बना सकते हैं!

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