व्यापार में भी सिर्फ पैसा ही सब कुछ नहीं है – 2 सितम्बर 2014

धन

जब मैं जर्मनी में था तो एक महिला मेरे एक व्यक्तिगत-सलाह-सत्र में आई। उसकी कुछ समस्याएँ थीं और वह समझ नहीं पाती थी कि वह इस विषय में क्या करे। इनमें से एक समस्या के संबंध में उसकी किंकर्तव्यविमूढ़ता पर आज अपने ब्लॉग में लिखना चाहता हूँ: एक ऐसे धंधे में, जो लोगों की सेवा पर आधारित है, ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है? ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की सेवा करना या उस धंधे से अपने लिए ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाना?

जो महिला मेरे पास आई थी वह एक तरह की फ़िजिओथेरपि करके अपनी आजीविका कमाती थी। वह अपने काम में पर्याप्त सफल थी: उसके मरीज़ों को सिर्फ दो या तीन बार उसके पास आना पड़ता था। उसके बाद वे नहीं आते थे क्योंकि आने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी। दो-तीन सत्रों में ही वह उनकी पीठ का दर्द ठीक कर देती थी, उनके घुटने का दर्द जाता रहता था या कम से कम उसमें काफी सुधार हो जाता था और फिर वह अपने सत्रों में उन्हें घर में करने के बहुत से व्यायाम, आसन वगैरह बता देती थी, जिन्हें करने पर उन्हें लाभ होता था। उन बीमारियों के लिए उन्हें आगे और सत्रों की बुकिंग कराने की, यानी अतिरिक्त पैसे खर्च करने की ज़रुरत ही नहीं होती थी।

महिला इस स्थिति से कुल मिलाकर खुश थी। सड़क चलते उसके मरीज़ उससे मिलते और उसका तहे दिल से शुक्रिया अदा करते और कहते कि उसके इलाज-सत्रों से उन्हें बहुत लाभ पहुँचा है। कौन ऐसी प्रशंसा से खुश नहीं होगा?

लेकिन उसका पति? वह उससे कहता कि उसे एक अच्छे व्यापारी की तरह व्यवहार करना चाहिए। इलाज की शुरुआत में ही उसे लोगों से कहना चाहिए कि अगर वे इलाज शुरू करना चाहते हैं तो कम से कम पाँच सत्रों का पॅकेज उन्हें लेना होगा। भले ही वे दो सत्रों में ही क्यों न ठीक हो जाएँ उन्हें पूरे पाँच सत्रों का शुल्क अदा करना होगा। तब उन्हें पहले ही निश्चय करना पड़ता कि वे पूरे सत्रों में शामिल होना चाहते हैं या नहीं।

इस विषय पर वह मेरी राय लेना चाहती थी। क्या उसे लोगों को पाँच बार बुलाकर ज़्यादा पैसे कमाने चाहिए भले ही उन्हें इतने चक्कर लगाने की ज़रुरत न हो?

मैंने उससे कहा कि बिलकुल नहीं। सबसे पहले मैंने उससे पूछा: इस विषय में उसका दिल क्या कहता है? और उसने जवाब दिया कि ऐसा करना उसे उचित नहीं लगता। जिस तरह वह काम कर रही है, उससे वह संतुष्ट है और बाहर के लोगों से मिलने वाली सलाहों के कारण कभी-कभी उसे एहसास होता है कि वह कुछ गलत कर रही है। मैंने कहा: तो फिर, जैसा तुम्हें ठीक लगता है, वही करो।

दूसरी बात यह कि अपने काम के लिए तुम जो कुछ भी अच्छा कर सकती हो, पहले ही कर रही हो: यानी तुम अपने ग्राहकों को खुश और संतुष्ट कर रही हो। क्या तुम नहीं जानती कि व्यापार का अर्थ अपने ग्राहकों को लूटना नहीं है? उनकी जेब से ज़्यादा से ज़्यादा पैसा निकलवाना नहीं है। व्यापार सेवा प्रदान करना है, कोई ऐसी वस्तु बेचना है, जो दूसरों की आवश्यकता की पूर्ति करती हो, दूसरों की सहायता करती हो, उन्हें सुख पहुँचाती हो!

आपके लिए संतुष्ट और प्रसन्न ग्राहक से बढ़कर कोई विज्ञापन नहीं हो सकता! अगर आपका कोई ग्राहक सड़क चलते आपसे कहता है कि वह आपकी सेवाओं से खुश है, तो यह बात वह दूसरों से भी कहेगा। वास्तव में वह कहेगा, 'उसने दो सत्रों में ही मुझे पूरी तरह ठीक कर दिया!' बल्कि यह भी जोड़ेगा कि इसी तकलीफ के लिए पहले कराए इलाजों से आपका इलाज कितना बेहतर रहा- 'वहाँ इतना पैसा खर्च किया, इतना समय बरबाद किया मगर ज़रा आराम नहीं हुआ था।' इससे आपको और ज़्यादा ग्राहक मिलेंगे, जिससे लम्बे समय में आपको लगातार अधिक से अधिक काम मिलता रहेगा और आमदनी होती रहेगी जोकि पहली बार आए ग्राहक को एक बार में ही लूटने-खसोटने से कभी नहीं हो सकती!

इस मामले में सबसे मज़ेदार बात यह है कि कोई भी व्यक्ति दिल से हमेशा उचित कदम उठाना चाहता है। यह उसकी असुरक्षा और अपनी भावनाओं पर पूरा विश्वास न करने का नतीजा होता है, जिसके कारण वह भ्रमित होता है और कई बार कोई दूसरा रास्ता अपनाने के लिए उद्यत हो जाता है। इस तरह के भय से मुक्त हों, उन्हें कान न दें- अपने दिल की आवाज़ सुनते हुए उचित रास्ता अपनाएँ!

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