ध्यान में विचारशून्यता की बात महज भ्रम है या व्यापार कौशल! 11 नवंबर 2013

मैं समझता हूँ कि आप लोगों ने ध्यान की एक प्रचलित परिभाषा सुनी होगी, जो मेरे विचार में गलत परिभाषा है। लोग अक्सर कहते हैं कि ध्यान मन (मस्तिष्क) को विचारशून्यता की स्थिति में लाने का अभ्यास है। यह ऐसी स्थिति है जब आप कुछ भी सोच नहीं रहे होते, आपका मस्तिष्क जब पूरी तरह रिक्त हो जाता है। मेरा मानना है कि ऐसा संभव ही नहीं है। इससे भी आगे बढ़कर मैं कहना चाहूँगा कि इस विचार का उपयोग आजकल पैसा कमाने में किया जा रहा है!

यह संभव ही नहीं है। क्या आप कभी ऐसी स्थिति में पहुँच सके हैं? मैं नहीं समझता कि ऐसा हो सकता है। क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति से मिले हैं, जो यह दावा करता है? अगर ऐसा कोई व्यक्ति है तो फिर इसका प्रमाण क्या है? कौन इस बात की जांच करेगा कि उसका दावा सही है? यह ऐसा ही दावा है जैसा कि लोग कहते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है या वह हर जगह मौजूद है-आप उसे देख नहीं सकते, आप उसे छू नहीं सकते, फिर कैसे कहा जा सकता है कि वह है? इस बात का प्रमाण कहाँ है कि ईश्वर है या इस बात का कि आप पूर्ण विचारशून्यता की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं?

सोचने के लिए यह खयाल रुचिकर हो सकता है लेकिन कार्यरूप में यह असंभव है। इस ‘रिक्त-मस्तिष्क’ वाली स्थिति प्राप्त करने के अभ्यास की पहली सीढ़ी क्या है? आपको शून्य पर ध्यान केन्द्रित करना होता है! आप अपने मस्तिष्क को उस बिन्दु तक ले जाते हैं जहां आप कुछ नहीं सोचते। लेकिन कुछ न कुछ तो होगा ही, भले ही वह अतिसूक्ष्म विचार हो, यही कि कुछ नहीं सोचना है!

इसे इस प्रकार देखें: आपका पेट है, खाद्य पदार्थों को हजम करने के लिए और उसके लिए भोजन चाहिए। आपकी आँख बनी हैं, देखने के लिए और उन्हें देखने के लिए कुछ चाहिए। आपके कान आवाजों को सुनने के लिए बने हैं और आवाज़ चाहिए, जिन्हें वे सुन सकें। आपका मस्तिष्क बना है सोचने के लिए और यह आवश्यक है कि वह सोचे। उसके बगैर उसका अस्तित्व ही संभव नहीं है। मस्तिष्क में किसी न किसी विचार का होना अवश्यंभावी है। अगर आप भोजन नहीं करेंगे तो आप भूखे मर जाएंगे। अगर आप सोचेंगे नहीं तो क्या होगा? आपका मस्तिष्क बिना विचार के ज़िंदा बच नहीं सकता।

चाहे जितना अच्छे शब्दों में इस बात को प्रस्तुत किया जाए, एक प्रश्न बरकरार रहेगा: आप अपने मस्तिष्क को इतनी पीड़ा क्यों पहुंचाना चाहेंगे? मस्तिष्क का विचार से सीधा संबंध है और मस्तिष्क को विचार से दूर रखना उसे उसकी खुराक से वंचित कर देना है! इसके विपरीत आप उसे कोई बढ़िया पोषक-तत्व क्यों नहीं मुहैया कराते? सोचना, विचार करना बहुत अच्छी बात है। अपने मस्तिष्क को कुपोषण का शिकार न बनाएँ-और अपने विचारों को समाप्त करने का प्रयास करते हुए उसे विचारशून्य बनाने की कोशिश करना एक तरह की मूर्खता और उसके प्रति लापरवाही के सिवा कुछ नहीं है।

फिर क्यों लोग आपसे कहते हैं कि यह आपका लक्ष्य होना चाहिए? क्योंकि वे अपना व्यापार चलाना चाहते हैं। इससे ज़्यादा अच्छा धंधा क्या होगा कि जिस चीज़ की इच्छा आप अपने ग्राहक के मन में पैदा कर देते हैं वह चीज़ आप उसे कभी देते नहीं हैं और न वह कभी उसे प्राप्त कर पाएगा और फिर भी वह उसे थोड़ा बहुत प्राप्त करने की आस में आपके पास बराबर आता रहेगा। आपको बताया जाता है कि एक ऐसी अवस्था, जो किसी भी तरह प्राप्त नहीं की जा सकती, आपको अतीव आनंद से भर देगी। अब आप उसके लिए मरे जा रहे हैं, उसे मुंहमांगी कीमत पर खरीद रहे हैं कि किसी तरह उस लक्ष्य तक पहुँच सकें। ये वही लोग हैं, जो भगवान बेचते हैं, जो हवा में से भभूत या सोना निकालने का चमत्कार बेचते हैं, जो कि कोई भी समझ सकता है कि संभव नहीं है। वही लोग अब कुछ ज़्यादा होशियार हो गए हैं और अब ध्यान-योग बेच रहे हैं। उनके ग्राहक एक ऐसे चक्रव्यूह में प्रवेश कर रहे होते हैं, जहां से बाहर निकल पाना मुश्किल है, ऐसी चीज़ पाने की कोशिश, जो प्राप्त होना असंभव है, एक ऐसा लक्ष्य जिसे हासिल करने का दावा वह गुरु करता है।

लेकिन इसमें इन गुरुओं की गलती नहीं होती क्योंकि अधिकतर योग और ध्यान-योग के गुरु यह विचार इसलिए प्रचारित करते हैं कि उन्हें भी उनके गुरु द्वारा मूर्ख बनाया गया होता है कि यह मस्तिष्क की कोई अद्भुत और दुर्लभ अवस्था है। सच बात तो यह है कि बहुत कम लोग मुझे मिले, जो यह दावा करते हैं कि उन्होंने विचारशून्यता की यह अवस्था वास्तव में प्राप्त की है। कुछ लोग भ्रमित होते हैं और कहते हैं कि शायद एकाध मिनट के लिए यह अवस्था उन्होंने प्राप्त की है। मगर अधिकतर लोग यह ईमानदारी के साथ स्वीकार करते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने से कोसों दूर हैं। वे पूरा प्रयास कर रहे हैं मगर अभी वहाँ पहुंचे नहीं हैं। अपनी इस हालत पर उन्हें संकोच होता है, बुरा लगता है और वे अपने आपको उन लोगों से कमतर आँकते हैं, जो इस विचारशून्यता की अवस्था को प्राप्त करने का दावा करते हैं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दूसरों से यह कहते हैं या किसी दूसरे से यह बात सुनते हैं। थोड़ा समय निकालकर मेरी बात पर गौर करें और फिर ध्यान करते समय विचारशून्यता प्राप्त करने का प्रयास करने के स्थान पर कोई अच्छी बात सोचें, कोई अच्छा विचार मन में रखें!

इस विषय पर इस ब्लॉग द्वारा आपके मन में थोड़ी सी हलचल पैदा करने के बाद मैं कल ध्यान-योग से संबन्धित कुछ दूसरे पहलुओं पर बात करूंगा।

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