ध्यान-योग कोई रहस्य नहीं है लेकिन परेशानी यह है कि आप ऎसी चीज़ नहीं बेच सकते, जो सबको उपलब्ध हो-13 नवंबर 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

मुझे अंदेशा है कि मेरे कल और परसों के ब्लोगों को पढ़कर मेरे कुछ पाठक संशय में पड़ गए होंगे। वे सोच रहे होंगे कि पहले मैंने अपना गुरु का जीवन त्यागा, फिर धर्म त्यागा और नास्तिक हो गया और अब ध्यान और योग के विरुद्ध भी लिखना शुरू कर दिया है! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि ऐसी बात बिल्कुल नहीं है! जिस तरह ध्यान का प्रचार किया जाता है, उससे मेरी असहमति है। ऐसा ज़ाहिर किया जाता है कि ध्यान कुछ विशेष, चुने हुए आध्यात्मिक लोगों के लिए ही है, जबकि मैं यह सलाह देता रहता हूँ कि सभी इसे करें। मैं स्वयं इसे पसंद करता हूँ लेकिन मेरे लिए इसकी परिभाषा बिल्कुल भिन्न है! मैंने कुछ ब्लॉग भी ध्यान-योग के संबंध में लिखे हैं, जिसमें मैंने स्पष्ट किया है कि मेरे लिए ध्यान का अर्थ क्या है। आज भी उसी संबंध में यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

सबसे पहले मैं एक वाक्य में यह परिभाषा दे रहा हूँ: अंग्रेज़ी में मेडिटेशन, हिन्दी और संस्कृत में ध्यान वह अभ्यास है, जिसमें आप पूरी तरह वर्तमान में होते हैं, 100% जाग्रत होते हैं, हर तरह से वाकिफ कि आप क्या कर रहे हैं।

कभी भी मैं यह नहीं कहता कि ध्यान का लक्ष्य विचारशून्यता है। मैं यहाँ तक मानता हूँ कि ध्यान का अभ्यास करने के लिए आपको किसी खास आसन में बैठने की आवश्यकता नहीं है और न ही किसी विशेष श्वसन तकनीक या किसी और चीज़ की। आप अपना काम करते हुए भी ध्यानस्थ हो सकते हैं या बातचीत, चित्रकारी करते हुए या खेलते हुए और यहाँ तक कि संभोग करते हुए भी! आपको उस वक़्त पूरी तरह वहाँ होना चाहिए, वर्तमान में; भविष्य में नहीं और न अतीत में। उस क्रिया में पूरी तरह उपस्थित, बस यही मेरे लिए ध्यान है।

मुख्य बात यह है कि हर कोई ध्यान कर सकता है! आपको विशिष्ट होने की ज़रूरत नहीं है! यह सभी के लिए सहज सुलभ है और किसी भी वक़्त। ध्यान के लिए वर्षों के अभ्यास की आवश्यकता नहीं है और न ही आपमें किसी कलात्मक प्रतिभा का होना आवश्यक है। यह कोई जटिल क्रिया नहीं है और इसे करने के लिए आपको किसी लॉरी को दांतों से खींचने या लोहे की राड को हाथों से मोड़ने का करिश्मा दिखाने की ज़रूरत नहीं है! आप, जी हाँ आप भी इसे कर सकते हैं!

अब यह बताएं कि क्या यह अच्छा नहीं होगा कि आप जानें और आपका पड़ोसी न जाने? उसमें कुछ रहस्य या पेचीदगी हो तो क्या वह ज़्यादा रोचक नहीं हो जाएगा? यही वह विचार है जिसे गुरु और ध्यान का व्यापार करने वाले पसंद करते हैं और रुपया कमाते हैं! वे चाहते हैं कि आप न सिर्फ कुछ खास बल्कि अपने आसपास के लोगों से बेहतर महसूस करें और इसलिए वे ध्यान को कुछ विशिष्ट और जटिल बनाकर पेश करते हैं!

उनका यह व्यवहार, दरअसल, आपके अहं को बढ़ाने के लिए होता है न कि उसे कम करने के लिए! तो, जब आप पंद्रह मिनट तक ध्यान करते हैं तो आप चेतना की उच्च अवस्था में होते हैं! तो, आपको पहले वहाँ जाना पड़ता है और फिर एक खास मुद्रा में आसन लगाना होता है, आपको एक विशिष्ट वातावरण चाहिए और आप उसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक घंटे तक कर सकते हैं! फिर दिन के बचे हुए 23 घंटे आपकी चेतना कहाँ मंडराती रही? नीचे ज़मीन पर, अलसाई हुई, जैसे बाकी सभी लोगों की चेतना पड़ी होती है? इसलिए आप इस एक घंटे तक खुद को विशिष्ट समझने लगते हैं और अपने भीतर शांति का अनुभव करते हैं, व्यापक ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार! लेकिन आप सारा दिन आनंद की उसी अवस्था में क्यों नहीं रह सकते?

जी हाँ, आप ध्यानस्थ होकर भी दिन के 24 घंटे अपना काम कर सकते हैं, खेल सकते हैं, किताब पढ़ सकते हैं और जो मर्ज़ी हो, वह कर सकते हें। आपको बिना एक स्थान पर बैठे, बिना विचारशून्यता को प्राप्त किए, लगातार आनंदमग्न रहना चाहिए!

स्वाभाविक ही, कोई गुरु आपको इतना बड़ा रहस्य नहीं बताएगा अन्यथा वे उस आश्चर्य मिश्रित प्रशंसा से वंचित हो जाएंगे, जो आपसे उन्हें प्राप्त होती है। ऐसा करने से उनका धंधा चौपट हो जाएगा! लेकिन सच्चाई यही है कि आप भी ध्यान कर सकते हैं। आपको सिर्फ सजग रहना है, चैतन्य रहना है, विचारशून्य नहीं!