क्या आप ध्यान साधना की अवधि से किसी की चेतना के स्तर को नाप सकते हैं? – 4 अप्रैल 2013

ध्यान

हमारे आश्रम में कुछ दिन पहले एक मेहमान आए थे। उनके साथ मेरी जो बातचीत हुई मैं उसे आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। हम ध्यान के बारे में बात कर रहे थे, ध्यान साधना के बारे में मेरे विचार और उसके बारे में आम तौर पर प्रचलित या प्रचारित विचार और दोनों के बीच भेद।

मैं अपने मेहमान के पास बैठा और कुछ इधर-उधर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा, 'अच्छा बताइए, आप दिन भर में कितना समय ध्यान में व्यतीत करते हैं?' वे मेरी तरफ जिज्ञासु आँखों से देख रहे थे और लगता था कि वे एक प्रभावशाली उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं। वे अनुमान लगा रहे थे कि मैं कम से कम एक घंटा तो अवश्य ही ध्यान और चिंतन-मनन में व्यतीत करता हूंगा, क्योंकि वे स्वयं काम पर जाने से पहले ऐसा करते हैं।

मैं उनकी तरफ देखकर मुस्कुराया और बताया कि क्योंकि हमारी नन्ही बच्ची अपरा हमारे साथ है, मैं उसके साथ खेलते हुए ध्यान में मग्न हो जाता करता हूँ। मेरा सारा ध्यान और चिंतन-मनन उसके साथ होना, उसके साथ समय बिताना है । उसे हँसाना, उसके साथ खेलना, किस तरह वह गेंद या दीवार पर चढ़ते छिपकली के पीछे भाग रही है यह सब देखते हुए ही मेरी ध्यान साधना हो जाती है।

मैं देख रहा था कि उनका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। कोशिश तो की, मगर मेरे इस ईमानदार उत्तर पर अपनी निराशा को वे छिपा नहीं पाए। मैं जानता हूँ कि उनके मन में यह विचार आ रहा है कि मैंने अपना आत्मनियंत्रण खो दिया है, कि मैं अपनी पहले अर्जित आध्यात्मिकता से बहुत नीचे आ गया हूँ। अपनी मानसिक स्थिति के बारे में मैं लापरवाह हो गया हूँ और यह भी कि उपयुक्त और धर्मसम्मत मार्ग से मैं भटक गया हूँ। अपने बारे में ऐसी बातें मैं पहले भी कई लोगों से सुन चुका था, इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ।

ज़ाहिर है कुछ लोग मेरे विवाह या मेरी पत्नी जो एक पश्चिमी महिला हैं, को इसका दोष देने लगते हैं कि उसने इस आध्यात्मिक या धार्मिक व्यक्ति को बिगाड़ दिया और उसे उसकी आध्यात्मिक साधना से दूर कर दिया। जो ऐसा करते हैं वे नहीं जानते कि ध्यान साधना के बारे में हमेशा से मेरे विचार आम पारंपरिक विचारों से ज़रा हटकर रहे हैं। आम तौर पर यह धारणा है कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति को विवाह नहीं करना चाहिए या बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए।

लेकिन यह तो तब ठीक माना जाएगा जब आप ध्यान को किसी प्रतियोगिता ही तरह समझें। जो ध्यान लगाकर सबसे ज्यादा समय तक बैठ सकता है वह जीता! ऐसा व्यक्ति इस प्रतियोगिता में दूसरों से पहले ज्ञान प्राप्त कर लेगा या उसे ज्ञान प्राप्त हो चुका है! जो आधा घंटा भी एक मुद्रा में नहीं बैठ सकते वे तो अभी शुरुआत कर रहे हैं, हार चुके हैं, भौतिकवादी हैं और आध्यात्मिक व्यक्ति हैं ही नहीं!

मैं ध्यान साधना को बिल्कुल अलग दृष्टि से देखता हूँ। मैं नहीं समझता कि इसके लिए आपको पद्मासन लगाकर ही बैठना होगा, आँखें बंद करनी होंगी और गहरी सांसें ही लेनी होंगी। ध्यान का अर्थ है कि आपकी चेतना सदा वर्तमान में उपस्थित रहे, अतीत या भविष्य के बारे विचार स्थगित रखते हुए आपको बोध होना चाहिए कि आप उस क्षण क्या कर रहे हैं, कर भले ही कुछ भी रहे हों!

और ठीक यही मैं करता हूँ जब अपरा के साथ होता हूँ। आपके पास ध्यान लगाने के अलावा कोई मौका ही नहीं होता जब आप अपरा के साथ होते हैं क्योंकि वह उस क्षण आपका सारा ध्यान अपनी ओर खींचे रहती है। आपको उसे देखते रहना पड़ता है और आप वही अनुभव करते हैं जो वह अनुभव कर रही होती है। आप उसके चेहरे की ओर देखें तो आपको पता चल जाता है कि वह क्या सोच रही है। उसके साथ खेलना, बात करना, अपने विचारों की तरफ उसे आकृष्ट करना और अपनी दुनिया दिखाना; इन सब बातों का मुझ पर अद्भुत असर होता है जो ध्यान साधना ही है। इससे मुझे परम आनंद और असीम शांति का अनुभव होता है।

बहुत बड़ा साधक होने का दिखावा करने के लिए अगर मुझे दिन के कई घंटे किसी बंद कमरे के एकांत में रहना पड़े तो वह मेरी कमी महसूस करेगी और मैं भी उसे मिस करूंगा। अपनी बेटी के साथ होना ही मेरा ध्यान है और मैं प्रसन्न हूँ कि मैं उसके साथ इस तरह समय व्यतीत कर सकता हूँ और उसे और अपने आपको खुश कर पाता हूँ।

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