आप ‘ध्यान’ लगा रहे हैं या सिर्फ उसका दिखावा कर रहे हैं? – 5 अप्रैल 2013

वाह! कल की डायरी लिखते हुए मुझे अंदाज़ नहीं था कि मैं 'ध्यान' पर प्रश्नोत्तर प्रतियोगिता शुरू कर रहा हूँ! जहां एक ओर मेरे लिए खुशी की बात है कि अधिकतर लोग मुझसे सहमत हुए कि अपरा के साथ खेलते हुए समय बिताना समय बिताने का एक अच्छा तरीका है; वहीं कुछ लोगों ने प्रश्न उठाया कि क्या समय व्यतीत करने के इस तरीके को 'ध्यान' कहा जा सकता है। मैं 'अवस्थित' या 'ध्यानस्थ' कैसे रह सकता हूँ जबकि मुझे हर वक़्त इस बात का भी ध्यान रखना होता होगा कि वह गिर न पड़े, उसे चोट न लग जाए। यह भी कि स्वाभाविक रूप से अपरा के पीछे भागते हुए आप बहुत क्रियाशील होते हैं न कि बैठ कर अपने शरीर को विश्राम और मन को शांति पहुंचा रहे होते हैं, जैसा कि एक ध्यानस्थ व्यक्ति को करना चाहिए। मैं समझता हूँ, समय आ गया है कि मैं 'ध्यान' के बारे में पुनः अपने विचारों को विस्तार से प्रस्तुत करूँ।

पहले हम 'ध्यानस्थ' व्यक्ति की पारंपरिक और शास्त्रीय कल्पना को लें। ऐसा व्यक्ति पद्मासन लगाकर बैठता है, उसकी पीठ सीधी होती है, हाथ घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रखे होते हैं और अंगूठे और तर्जनी के पोर आपस में मिले होते हैं। 'ध्यान' के बारे में किंचित जानकारी रखने वाले किसी बच्चे को भी आप कहें तो वह इस 'ध्यान' मुद्रा का बड़ा आकर्षक प्रदर्शन आसानी के साथ कर देगा, बाकायदा ऊंचे स्वर में 'ॐ' शब्द का उच्चारण करते हुए। 'ध्यान' की यह एक मान्य कल्पना है।

ध्यानस्थ अवस्था में हमें क्या करना चाहिए इसकी भी एक बंधी-बंधाई रूढ़िबद्ध धारणा है। वह यह कि अपने सारे विचारों को स्थगित कर दो, मस्तिष्क को रिक्त करो, कुछ भी मत सोचो। यही वह आधारभूत धारणा है जिसके वशीभूत अधिकतर लोग यह सोचते हैं कि उनके लिए ऐसा कर पाना असंभव है। 'कुछ मत सोचो' ही वह आदेश है जो कुछ लोगों को डराता है और कुछ दूसरे लोगों के लिए एक चुनौती पेश करता है।

मुझे विश्वास है कि जिन्होंने गंभीरता से ध्यान लगाने का प्रयत्न किया है उन्होंने गौर किया होगा कि ध्यानस्थ होने का यह कोई जादुई नुस्खा नहीं है। अगर आपका रियाज़ नहीं है तो कुछ देर बाद ही इस मुद्रा में आपके पैरों और पीठ में दर्द शुरू हो जाता है और आपका मस्तिष्क अपने आपको विचारशून्य बनाने के स्थान पर अपनी मर्ज़ी के मुताबिक अपना काम करता रहता है। आप कसमसाने लगते हैं और अगर आप लोगों के बीच बैठे हैं तो आप कितना भी शांत बने रहना चाहें और सोचें कि अब आपको कुछ आराम मिल रहा है, खिंचाव के कारण अनजाने में कुछ गॅस अवश्य विसर्जित हो जाती है, जो लोगों को सुनाई देकर आपको हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा सकती है।

मुझे लगता है हम सहमत होंगे कि यह ध्यान लगाने का कोई आदर्श तरीका नहीं है। मेरा विश्वास है कि जबकि ध्यान की यह छवि उसके प्रचार का एक लोकप्रिय विज्ञापन हो सकता है, है वह एक ढोंगी प्रदर्शन मात्र ही। ऐसे लोग भी हैं जिनके पास इस तरह ध्यान लगा सकने की शारीरिक और मानसिक शक्ति होती है और वे ऐसा बहुत समय तक भी कर सकते हैं मगर आम लोग, अगर उनमें ध्यान लगाने और उससे आत्मिक शांति प्राप्त करने की वाकई इच्छा है, तो कोई आसान तरीका ही पसंद करेंगे, अगर उन्हें पता हो कि ऐसा आसान तरीका भी हो सकता है।

जहां तक ध्यान लगाने की दूसरी विधियों का प्रश्न है इसकी कई विधियाँ हैं। एक है, नाद-ध्यान, जिसे हमारे मित्र थॉमस बहुत बढ़िया तरीके से करते हैं और जो संगीत के माध्यम से विश्रांति पहुंचता है और मस्तिष्क को एकाग्र करके उसे व्यर्थ विचारों से मुक्त करने में आपकी मदद करता है। दूसरा है, प्रकृति-भ्रमण, जिसके बारे में हमारे हिमालय भ्रमण पर निकले सहभागी मित्र आज रात आश्रम में वापस आकार हमें अवश्य बताएंगे ऐसा मुझे पूरा विश्वास है। तारों की छांव में या घने जंगल के सुनसान में पैदल चलना ध्यान का एक अनूठा तरीका हो सकता है, अगर आप वर्तमान में अवस्थित हो सकें। व्यायाम एक तरह का ध्यान हो सकता है और कला, पेंटिंग बनाना, जिसमें एक चित्र की रचना करते हुए आप अपनी कला में गुम हो सकते हैं। खाने का कोई पकवान बनाते समय, मसालों को अवचेतन में महसूस करते हुए आप उस पूरी प्रक्रिया में ध्यानस्थ हो सकते हैं। पौधा रोपते हुए, किताब पढ़ते हुए, यहाँ तक कि अपना कोई काम पूरी तल्लीनता के साथ करते समय भी आप ध्यानस्थ हो सकते हैं। जी हाँ, कंप्यूटर के सामने भी, शर्त यह है कि आपको उस खास क्षण में इस बात का इल्म होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं।

जैसा कि मैंने बताया, जब आपको यह ठीक-ठीक पता होता है कि किसी एक क्षण में आप यथार्थ में क्या कर रहे हैं, तब मैं उसे ध्यानस्थ होना कहता हूँ। और जब मैं अपनी नन्ही बच्ची के साथ खेल रहा होता हूँ, जब वह इधर-उधर दौड़ती है और मैं उसके पीछे होता हूँ या वह कुछ भी कर रही होती है और मैं उसे ध्यान से देखता रहता हूँ तब मैं उस क्षण में होता हूँ, यह जानता हुआ कि मैं ठीक-ठीक क्या कर रहा हूँ। आपको अपरा जैसे किसी बच्चे के साथ होना चाहिए-जैसे ही आपका 'ध्यान' उससे हटा, उसने कुछ गलत हरकत की! और यही है सबसे बढ़िया 'ध्यान'।

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