लड़कों की चाह और उसके परिणाम-पत्नियों के रूप में बिकती महिलाएं – 30 अप्रैल 2012

विवाह

पिछले हफ्ते मैंने तयशुदा विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के बारे में विस्तार से लिखा था। मैंने दहेज प्रथा के बारे में लिखते हुए बताया था कि महिलाएं विवाह के बाद लड़के और उसके परिवार के साथ रहने चली जाती हैं। यह बात, और कुछ और बातें, जैसे, पारिवारिक व्यापार में, जो पैतृक संपत्ति माना जाता है, हक़ आदि ऐसे कारण हैं जिनसे अधिकांश परिवार लड़के की चाहत रखते हैं। इस चाहत के बड़े व्यापक परिणाम होते हैं, जो अधिकतर बहुत कुरूप, दुखद और भयानक होते हैं।

इसका सबसे बुरा परिणाम यह है कि आधुनिक अल्ट्रा साउंड मशीनों से भ्रूण के लिंग की पहचान करके बहुत बड़ी संख्या में लड़कियों के भ्रूणों के गर्भपात कराए जा रहे हैं। इसके विरुद्ध आवाज़ उठने पर एक कानून बना दिया गया है जिसके अनुसार लिंग की पहचान करना और करवाना गैरकानूनी घोषित किया गया है। मैंने अपने पिछले किसी ब्लॉग में लिखा था कि इस कानून के आने के बाद भ्रष्ट डॉक्टर गैरकानूनी रूप से यह काम करके और फिर गर्भपात कराके और ज़्यादा रुपया कमाने लगे हैं। ये गैरकानूनी गर्भपात अक्सर बड़े खतरनाक होते हैं क्योंकि इन्हें गुप्त रूप से किया जाता है जहां उस जगह को असंक्रमित भी नहीं किया जाता और कई बार गर्भपात के लिए आवश्यक सारी सुविधाएँ भी वहाँ उपलब्ध नहीं होतीं। कई बार देखा गया है कि यह गैरकानूनी काम अयोग्य डॉक्टरों से कराया जाता है। इसके अलावा कई बार डॉक्टर लोगों को लिंग की गलत जानकारी देकर गर्भपात करा देते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य गर्भपात करके पैसा बनाना होता है।

लड़की पैदा न हो इस बेहूदी इच्छा की यह एकमात्र त्रासदी नहीं है। हम ऐसे लोगों के बारे में सुनते ही रहते हैं जो इस कारण अपनी गर्भवती पत्नियों को पीटते हैं कि वह लड़के को जन्म नहीं दे सकी। एक ऐसे ही दर्दनाक हादसे में एक व्यक्ति ने अपनी तीन माह की बच्ची को इतना पीटा कि वह मर गई। सिर्फ इसलिए कि वह लड़का चाहता था और उसके घर में लड़की पैदा हुई थी।

इन सब बातों के परिणामस्वरूप हालत यह हो गई कि लिंग अनुपात में असंतुलन आ गया। कई जगह लड़कियों की तुलना में लड़के बहुत अधिक संख्या में हैं। यह असंतुलन, लड़कों के लिए उपयुक्त लड़कियों की उपलब्धि को एक गंभीर समस्या बना देता है। ऊपर से जाति का प्रतिबंध तो है ही। यानि जो थोड़ी सी लड़कियां उपलब्ध हैं वे सिर्फ अपनी जाति में ही ब्याही जाएंगी परणामस्वरूप कई लड़कों के लिए लड़कियां उपलब्ध ही नहीं होंगी!

आजकल यह हो रहा है कि कई लोगों ने लड़कों के लिए लड़कियों की खोज के पारंपरिक तरीके को छोड़ दिया है क्योंकि उन्हें उस तरीके से लड़कों के विवाह की संभावना ही दिखाई नहीं देती। उन्होंने अब लड़कियां खरीदना शुरू कर दिया है। जी हाँ, औरत खरीदना। कई बार अखबारों में समाचार और लेख आते रहते हैं जिनमें बिहार के गरीब परिवार अपनी बच्चियों को बेच देते हैं। बिहार हमारे देश का सबसे गरीब प्रांत है इसलिए वे गरीब से गरीब परिवार के पास रुपया लेकर पहुंचते हैं और लड़कियों की बोली लगाते हैं। 30000 रुपए यानी लगभग 600 यूएस डॉलर पत्नी खरीदने के लिए पर्याप्त होते हैं।

यह संयोग बड़ा आश्चर्यजनक है कि मैं यहाँ यह लिख रहा हूँ और वहाँ अभी-अभी पूर्णेन्दु के पास फोन आया है कि क्या हम विवाह के लिए किसी गरीब लड़की की व्यवस्था कर सकेंगे! हम ऐसे व्यापार के बारे में सोच भी नहीं सकते और उस फोन को अधिक तवज्जो दिये बगैर रख दिया गया है।

तो आपने देखा, जहां अधिकतर लड़के अपना विवाह अपने अभिभावको से तय करवाते हैं और दहेज पाते हैं, वहीं कुछ पुरुषों को पत्नी प्राप्त करने के लिए खर्च करना पड़ता है क्योंकि अन्यथा वे शायद विवाह ही न कर पाएँ। ऐसे प्रकरणों में कई बार जाति महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। लड़की को बेचने वाला बाप शायद सोचता है कि उसने उसे बेचकर अच्छा ही किया क्योंकि अब उसके पास बचे हुए परिवार के भरण पोषण के लिए कुछ रुपया आ गया है और संभव है लड़की भी अच्छे जीवन में प्रवेश कर रही हो! शायद,…!

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