मैंने ज़िक्र किया था कि कई लोग जिनके विवाह में बहुत सारी परेशानियाँ होती हैं, बाहरी दुनिया को उसकी हवा तक नहीं लगने देते, अपने खास मित्रों तक को नहीं। क्योंकि भारत में मैं अक्सर ही ऐसे प्रकरण देखता रहता हूँ कि लोग दस-दस साल लड़ते-झगड़ते बिता देते हैं, मैंने लिखा था कि पश्चिम में लोग ऐसी समस्याओं से बहुत समय तक अपने आपको दुखी नहीं करते बल्कि अलग होने का निर्णय लेकर जल्द ही तलाक ले लेते हैं। मेरे कुछ भारतीय मित्रों ने बहुत उत्तेजित होते हुए मुझसे पूछा कि क्या मैं वास्तव में इस तरह तलाक लेकर अलग हो जाने का समर्थन करता हूँ। इस विषय पर मेरे विचार मैं यहाँ विस्तार से रखना चाहता हूँ।
मैं समझता हूँ कि आपको जीवन में अधिक से अधिक खुश रहना चाहिए। निस्संदेह, हम सब यही चाहते हैं कि हम खुश रहें और खुशी पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि वे तभी सुखी और प्रसन्न रह सकते हैं जब समाज, उनके आसपास के लोग, उनके बारे में अच्छा सोचें और इसके लिए वे अपने व्यक्तिगत जीवन की शांति को दांव पर लगा देते हैं, अपने घर की शांति को बाहरी प्रतिष्ठा पर न्योछावर कर देते हैं। इससे आपको थोड़ा-बहुत संतोष मिल जाता है कि दूसरे आपको प्रेमपूर्ण संबंध में बंधा हुआ एक अच्छा व्यक्ति मानते हैं लेकिन मेरे विचार में यह सच्चे प्रेम सम्बन्धों की खुशी के सामने, बहुत छोटी सी बात है! दरअसल, कई ऐसे लोग हैं जो रोज़ के घरेलू लड़ाई-झगड़ों और तनावों को सहन करते रहते हैं सिर्फ इसलिए कि उन्हें तलाक न लेना पड़े। जब आपका दुख इतना बड़ा है और आप जानते हैं कि आप कुछ भी कर लें, इस संबंध को जारी नहीं रख सकते तो मुझे लगता है कि आपको अब बिल्कुल लड़ना-झगड़ना नहीं चाहिए!
मैं जानता हूँ कि पश्चिम में यह कदम उठाना बिल्कुल आसान है क्योंकि तलाक वहाँ कलंक नहीं माना जाता और भारतीय समाज में वही लोगों को दहशत में डाल देता है। पश्चिम का व्यक्तिवाद इसमें लोगों की मदद करता है। लेकिन इसके बावजूद मैं यह भी महसूस करता हूँ कि संबंध तोड़ने की इस आसानी की भी अति हो सकती है। यह जो थोड़े-थोड़े समय के संबंध बनते-बिगड़ते हम पश्चिम में देखते हैं यह इसी आसानी का नतीजा है। लोग इतनी जल्दी-जल्दी अपने साथी बदलते हैं जैसे कपड़े बदल रहे हों। हर बार जब आप उनसे मिलते हैं कोई नया बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड उनके साथ होता है या होती है, जिन्हें वे अपने ‘जीवन का सबसे बड़ा प्यार’ बताकर आपसे मिलवाते हैं। जब आप उनसे पूछते हैं कि पिछले वाले का क्या हुआ तो वे कहते हैं, ‘ओह, वह चल नहीं पाया’।
समस्या, दरअसल, यह होती है कि अलग होना वहाँ इतना आसान हो गया है कि वे उसे चलाने की आवश्यकता ही नहीं समझते, कोशिश ही नहीं करते। मेरा कहना है कि एक तरफ जहां आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) भारतीय युवाओं के स्वप्न चूर-चूर किए दे रहे हैं वहीं पश्चिमी युवा अपने जीवन साथी से ऐसी-ऐसी अपेक्षाएँ कर बैठते हैं कि वे संबंध को जारी रखने के लिए थोड़ा सा भी समझौता नहीं करना चाहते! अक्सर वे यह नहीं समझ पाते कि ऐसे व्यक्तित्व का कोई अस्तित्व ही नहीं है जिसका वे सपना देख रहे हैं और भूल जाते हैं कि दूसरे की भी अपनी कुछ कल्पनाएँ होंगी।
जब दो लोगों का अहं आपस में टकराता है तभी समस्याएं जन्म लेती हैं चाहे उनकी कोई भी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि हो। मेरी धारणा है कि आपको हमेशा अपने दिल की बात सुननी चाहिए और अपने अहं को काबू में रखना चाहिए। अगर कोई ऐसा तरीका है कि आप ज़रा सा अपने अहं को पीछे रखते हुए अपने संबंध को बनाए रख सकें तो आपको ऐसा अवश्य करना चाहिए लेकिन ऐसे समझौते अपनी खुशी की कीमत पर कभी न करें। अगर आपको लगता है कि आपको बहुत भारी समझौते करने पड़ रहे हैं और इससे आप अपने जीवन की खुशी गंवा रहे हैं तो उन्हें सालों-साल जारी न रखें। हर हाल में संबंध बनाए रखने की ज़िम्मेदारी का बोझ ढोते न रहें। जीवन बीत जाएगा और आपको पता भी नहीं चलेगा।
अगर संबंध को बनाए रख पाने का कोई उपाय आपको दिखाई नहीं देता तो इस आशा में आत्मसमर्पण न करें कि अगले जन्म में वह बेहतर हो सकेगा। यह जीवन बहुत कीमती है, उसे यूं ही बरबाद न करें।
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