अधिकांश भारतीयों के लिए प्रेम-विवाह और आयोजित विवाह के बीच का विवाद एक बहुत बड़ा मुद्दा है। क्योंकि मैं आयोजित विवाहों को बहुत सी परेशानियों का मूल कारण मानता हूँ और इसके खिलाफ ब्लॉग लिखता हूँ तो स्वाभाविक ही मेरे पास इसके समर्थकों की बहुत सी प्रतिक्रियाएँ आती हैं जो विपरीत होती हैं। दरअसल बहुत से लोग ऐसे हैं जो प्रेम-विवाह के इतने विरोधी हैं कि उसे भारतीय संस्कृति को तबाह करने वाला मानते हैं। और वे पश्चिमी संस्कृति के मत्थे इसका दोष मढ़ते हैं। इस विषय में मैं कुछ बातें साफ करना चाहता हूँ।
पहली बात तो यह कि कोई नहीं कह रहा है कि आयोजित विवाह सफल हो ही नहीं सकते। जब मैं लिखता हू तो अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर लिखता हूँ और जब कि मेरे माता-पिता, जिनका विवाह एक आयोजित विवाह था, अपने विवाह में सारा जीवन सुख से रहे, मैं अपने आसपास कई ऐसे लोगों को भी देखता हूँ जिनके विवाहों को कतई सफल विवाह नहीं कहा जा सकता। सफल विवाह से मेरा मतलब यह है कि सिर्फ दंपति अपनी नियति को स्वीकार करके विवाह में बने ही न रहें बल्कि वे आपस में प्रेम करते हुए जीवन गुजारें और अपने जीवन साथी के साथ खुश रहें।
मेरी नज़र में जो लोग अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं और प्रकारांतर से अपने धर्म पर कुछ ज़्यादा ही गर्व करने लगते हैं, दावा करते हैं कि उनकी बात ही सच है। प्रेम विवाह भी कभी सफल तो कभी कभी असफल भी हो जाते हैं, तो वे उनकी नज़र में पश्चिम से आयातित संस्कृति की देन होते हैं जो हमारी मूल संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं।
वास्तविकता यह है कि पश्चिम में भी पहले आयोजित विवाह हुआ करते थे। मध्य युग में तो वे आम थे और जहां निचली जातियों में प्रेम विवाह पहले शुरू हुए संभ्रांत समाज में आयोजित विवाह बहुत समय बाद तक भी होते रहे, जिनमें बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से ऐसे परिवारों में लड़कियों का विवाह किया जाता था जो उनके लाभ में बढ़ोतरी कर सकता था। यह 19 सदी तक भी जारी रहा। विशेषकर राजपरिवारों में तो राष्ट्रों के बड़े बड़े पदाधिकारियों के और सम्राटों के संबंध इन विवाहों द्वारा प्रगाढ़ किए जाते थे।
जब मैं ग्रीस में था तो वहां के बुजुर्गों ने मुझे बताया कि उनके बचपन में उन्होंने भी अरेंज्ड मैरेज देखी थी। तो इस तरह आयोजित विवाह पश्चिम के लिए कोई बाहर की चीज़ नहीं है, या कम से कम यूरोप में तो नहीं ही है। बस इतना है कि उसका प्रचलन कम हो गया है और उसे पुरातनपंथी माना जाता है जो अब उतना प्रभावशाली नहीं रहा और समाज में उसकी मान्यता में कमी आ गई है क्योंकि लोगों ने समझ लिया है कि ऐसे विवाह व्यावहारिक नहीं हैं और आज के समाज के लिए किसी काम के भी नहीं हैं। यह सिर्फ एक प्रकार का विकास है और आज वे आयोजित विवाहों को अतीत की किसी बीती घटना के रूप में याद भर कर लेते हैं। जिस तरह भारत में प्रेम विवाहों के लिए पश्चिम को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, मैं कभी कभी सोचता हूँ कि पश्चिमी लोगों ने अपने समय में किसको दोष दिया होगा!
यह सब सोचते हुए मुझे विश्वास है कि आप समझ पाएंगे कि यह एक ऐसी बात है जिसमें समय के साथ स्वाभाविक रूप से बदलाव आता है। पश्चिम में धीरे-धीरे ही इसे मान्यता मिली होगी और जब ज़्यादा से ज़्यादा प्रेम-विवाह होने लगे तो धीरे-धीरे आयोजित विवाह समाप्त होते गए और अब यह उनकी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा। इसी तरह भारत में भी इसका खत्म होना अवश्यंभावी है, लेकिन इस बात के लिए पश्चिम को दोष दिया जाए यह गलत है।
भारतीयों को इसे मानना ही होगा क्योंकि यह तर्कपूर्ण और स्वाभाविक बात है। पश्चिमी अनुभव से हम इसे घटित होता हुआ देख चुके हैं। भारत में भी हम देख रहे हैं कि किसी परिवार में अगर एक लड़के ने प्रेम विवाह किया है तो कुछ समय के बाद देखा जाता है कि पूरे परिवार ने उस विवाह को स्वीकार कर लिया है, और वह एक उदाहरण भी बन जाता है। अनिच्छा से ही मगर उनके पास अब कोई चारा नहीं बचा है। वे अब भी यही सोचते हैं कि यह गलत है मगर लोगों को ऐसा करता हुआ देख रहे हैं।
आशा करता हूँ कि कल मैं अपने ब्लॉग में इसी विषय पर कुछ दूसरी संस्कृतियों में होने वाले विकास और परिवर्तनों के बारे में लिख सकूँगा।
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