आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) में लोगों के सुखी न रह पाने का मुख्य कारण-26 अप्रैल 2013

कल मैंने हर आयु समूह के भारतीय दंपतियों के साथ चर्चा के दौरान मिले अपने अनुभव के आधार पर उनके दाम्पत्य जीवन की हालत का वर्णन किया था। उनकी बहुत सारी समस्याएं हैं और मैं साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि उनमें से बहुसंख्य दंपति अपने संबंधों से प्रसन्न नहीं हैं। सुखी दंपति दुर्लभ अपवाद ही हैं। और मेरे लिए यह स्पष्ट है कि किस बात को दोष दिया जाना चाहिए:आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के भारतीय विचार को!

विवाहों को तय करना या आयोजित करना कई समस्याओं को जन्म देता है। पुराने जमाने में, हो सकता है कि इनसे काम चल जाता रहा हो। मैंने इस बात को भी रेखांकित किया था कि कैसे मेरी दादी माँ के जमाने में बच्चों के विवाह उनके जन्म लेते ही, बहुत छोटी उम्र में तय कर दिये जाते थे। बच्चे इस एहसास के साथ ही बड़े होते थे कि उन दोनों को जीवन भर साथ रहना है। इसके अलावा अपना गाँव छोडने का न तो कोई विचार करता था न ही आज की तरह उसका कोई अवसर ही उपलब्ध होता था। साथ-साथ बड़े होने के साथ आपसी प्रेम पुष्पित-पल्लवित होता रहता था।

आज के जमाने में ऐसा करना संभव नहीं है और इसीलिए ऐसे प्रयास असफल हो रहे हैं। आजकल अभिभावक तुरत-फुरत अपने 25 साला बच्चों के लिए जीवन-साथी चाहते हैं। आप किसी प्रौढ़ और समझदार व्यक्ति को किसी अजनबी के साथ अचानक नत्थी कर दें और सोचें कि सिर्फ विवाह कर देने से दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगें तो यह अपेक्षा अनुचित ही कही जाएगी। उन्होंने महाविद्यालयों में अध्ययन किया है, देश-विदेश की यात्राएं करते हुए दुनिया देखी है और उसी अनुसार अपने जीवन के स्वप्न देखे हैं। जीवन-साथी के बारे में उनकी अपनी अलग कल्पनाएँ हैं और अचानक आप उन्हें किसी अजनबी के सामने खड़ा कर दें, जिसे आपका परिवार भी ठीक से नहीं जानता, और कहें कि अब आगे का सारा जीवन तुम्हें उसके साथ गुजारना है तो यह कैसे संभव हो सकता है। वह एक बार देखने भर से वह कैसे समझ पाएगा कि जिसके साथ उसे सारा जीवन गुजारना है वह उसके सपनों के राजकुमार या राजकुमारी से मेल खाता है या नहीं!

अगर इन बच्चों को, जो वास्तव में अच्छे खासे वयस्क होते हैं, यह आज़ादी दे दी जाए कि वे अपने लिए जीवन साथी स्वयं तलाश लें तो अपनी कल्पनाओं के अनुरूप वे यह काम बेहतर ढंग से कर सकते हैं। अगर उनकी कुछ अपेक्षाएँ असंभव सी हैं तो उनके पास वक़्त होता है कि वे स्वयं अपनी वास्तविकता को समझें और अपनी अपेक्षाओं को थोड़ा नीचे लाकर उन्हें अपने स्तर के अनुकूल बना लें। लेकिन आयोजित विवाहों में उनके पास अपना स्वप्नलोक होता है, जिसे कुछ हद तक बॉलीवुड के चरित्रों ने निर्मित किया होता है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि जब उन्हें अपने माता-पिता द्वारा तय किए गए जीवन-साथी के साथ रहना पड़ता है तो वह स्वप्नलोक भरभराकर ढह जाता है। उन्हें आपने यह मौका ही नहीं दिया कि वह वास्तविकता को समझें, अपनी अपेक्षाओं के साथ थोड़ा सम्झौता करें और उन्हें यथार्थ के धरातल पर ले आएँ!

इस समाज में ठीक यही हो रहा है। ढ़ोर-बाज़ार की तरह बच्चों के सौदे हो रहे हैं और बहुत से लड़के लड़कियां ऐसी शादियों को उचित भी समझते हैं। वे अपनी नियति को स्वीकार कर लेते हैं भले ही यह उनके लिए अप्रिय होता है। समय गुज़रता रहता है और अंततः उन्हें लगता है जीवन बीत गया और उन्हें पता तक नहीं चला! पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें लगता है कि वे लगातार लड़ते-झगड़ते रहे, अपने मृत स्वप्नों को श्रद्धांजलि अर्पित करते रहे और अपनी अवास्तविक और अतृप्त इच्छाओं नष्ट होता हुआ देखते रहे। वे आपको यह भी बताएंगे कि उन्हें जीवन में एक पल के लिए भी प्रेम का एहसास नहीं हुआ।

अपने गुहा-निवास से पहले जब मैं एक गुरु था, मैंने सारे भारत का भ्रमण किया था, एक साथ हजारों लोगों से मिला करता था, बहुत से परिवारों के यहाँ उनके घरों में रहता था और उस वक़्त मुझे बड़ी संख्या में लोगों को और उनकी वैवाहिक समस्याओं को जानने का मौका मिला। मैं सन 1997 से पहले की बात कर रहा हूँ, 16 साल पहले की। कोई सोच सकता है कि समय के इतने अंतराल के बाद चीज़ें बदली होंगी, उनमें कुछ सुधार आया होगा; मगर नहीं, आयोजित विवाहों को लेकर समस्याएं पहले से भी अधिक उग्र हो गई हैं।

मैं नहीं कहता कि प्रेम-विवाह हमेशा सफल ही होते हैं। मैं जानता हूँ कि ऐसा नहीं है। पश्चिम में भी मैंने आपसी संबंधों में कई समस्याएं देखी हैं, जहां लोग अपने साथी का चुनाव स्वयं करते हैं, विवाह से पहले प्रेम को भी जांच-परख लेते हैं। उनकी भी समस्याएं होती हैं मगर यहाँ, भारत में तो लगता है जैसे विवाहों को बाकायदा आयोजित या प्रायोजित करके वे समस्याओं को न्योता देते हैं। भारत में अकेले या तलाक़शुदा व्यक्ति की खराब सामाजिक हैसियत के चलते लोग जीवन साथी की तलाश में उतावले हो जाते हैं, और इस तलाश को आयोजित विवाहों का विचार आसान बनाता है, और फिर किसी भी हालत में उस जीवन साथी के साथ निबाह करना उनकी मजबूरी हो जाती है।

मैं अपनी इस बात को पुनः रेखांकित करना चाहता हूँ कि आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) समाज के लिए बुरे हैं और आज के आधुनिक समाज में उनकी व्यवहार्यता समाप्त हो चुकी है। ऐसे विवाह समस्याएं पैदा करते हैं और लोगों को प्रेम और सुख देने की जगह उनके भीतर घृणा और दुख भर देते हैं।

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