आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) में स्वीकृति और अस्वीकृति का अनैतिक खेल-8 मार्च, 2013

विवाह

मैं आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के बारे में हाल में बहुत कुछ लिखता रहा हूँ। इन बातों को बार-बार रेखांकित करते हुए कि ऐसे विवाह बहुत सी समस्याओं का कारण होते हैं, दहेज प्रथा के बारे में, टूटते सपनों और दिलों के बारे में, पति-पत्नी के बीच लड़ाई-झगड़ों के बारे में और परिवारों के बीच इसी कारण से पैदा होती कटुता और वैमनस्य के बारे में। यह सब पढ़ने के बाद आपके मन में यह खयाल तो अवश्य आता होगा कि क्या बात है कि इतनी बुराइयों के बाद भी आज अधिकांश विवाह आयोजित (अरेंज) ही किए जाते हैं। क्यों लोग आज भी अपने बच्चों के विवाह एक अनजाने व्यक्ति से करना इतना महत्वपूर्ण समझते हैं? उत्तर है, सिर्फ इसलिए कि समाज ही इस तरह चल रहा है, इसी को सुविधाजनक मानता है।

मैं इस बात को एक उदाहरण की सहायता से समझाने की कोशिश करता हूँ। माना कि एक भारतीय परिवार है जिसका 30 साल का लड़का अभी भी अविवाहित है। वह भारतीय तरीके से विवाह नहीं करना चाहता और अपने अभिभावकों से कहता है कि उसकी महिलाओं में कोई रुचि नहीं है और वह कभी विवाह नहीं करेगा। उसके अभिभावक जानते हैं कि वह बिना किसी मकसद के यह बात यूं ही कह रहा है और दूसरे लड़कों की तरह उसके भीतर भी विवाह की अभिलाषा होगी। ऐसा सोचकर वे लड़की खोजने के काम में लग जाते हैं और जब वे एक लड़की तय कर लेते हैं तो उसे कहना पड़ता है, ‘ओके, जब इतना ज़ोर डाल रहे हैं तो…’

लेकिन स्वाभाविक ही उन्होंने लड़की अपनी जाति और उपजाति में ही ढूँढी होगी और यह बात उनके चुनाव के लिए लड़कियों की संख्या सीमित कर देती है। दरअसल यह बहुत मुश्किल होता है कि इतनी सीमित संख्या में से किसी लड़की को पूरे मन से पसंद किया जा सके। कोई लड़की बहुत काली होती है, दूसरी मोटी, तीसरी उनके लड़के से कुछ ऊंची हो सकती है और कोई और थोड़ा तुतलाती है। कुछ लड़कियों के अभिभावक भी उस लड़के को अपनी लड़की के लायक नहीं समझते होंगे, उनकी अपेक्षा से कम वेतन के कारण या सिर्फ इसलिए कि वह दिखने में उतना स्मार्ट नहीं है या कुछ मोटा है या कि वह थोड़ा लंगड़ाकर चलता है।

फिर भी आम तौर पर अस्वीकृति अधिकतर लड़कियों के खाते में ही आती है। दोनों परिवारों के बुजुर्ग आए हुए रिश्तों को अस्वीकार करते चले जाते हैं और कुछ दिन बाद ‘विवाह बाज़ार की मंदी’ को देखते हुए सोचते है कि बिल्कुल पूरी तरह योग्य वर या वधू मिलना मुश्किल है, और अपनी अपेक्षाओं को क्रमशः कम करते चले जाते हैं। चलिए, अब लड़की बहुत गोरी न भी हो तो चलेगा और लड़का अगर कुछ ज़्यादा ही ‘स्वस्थ’ (यानी मोटा) है तो भी चलेगा। लड़कियों के परिवार अपनी अपेक्षाओं को कम करने के मामले में भी कुछ अधिक ही नीचे आ जाते हैं। क्योंकि लड़की का विवाह होना अधिक महत्वपूर्ण है-विवाह न हुआ तो जीवन में उसका क्या बनेगा?

बात एकदम स्पष्ट है: अधिकांश औरतें आज भी कोई पैसा कमाने वाला काम नहीं करतीं। अगर करती भी हैं तो उन्हें पुरुषों से कम वेतन प्राप्त होता है। इसके अलावा उनके लिए उपयुक्त और पर्याप्त वेतन वाली कोई नौकरी ढूंढ पाना भी मुश्किल होता है। याद रखें, मैं मेट्रो शहरों की बात नहीं कर रहा हूँ, छोटे शहरों, कस्बों और गावों की बात कर रहा हूँ। लड़की के अभिभावक विवाह होने तक ही लड़की का भरण पोषण करने की ज़िम्मेदारी समझते हैं। अगर वह विवाह नहीं करती और इस बीच उसके माँ-बाप का देहांत हो जाता है तो वह किस तरह इतना बड़ा जीवन अकेले गुज़ार सकेगी? अपने भाई के परिवार पर बोझ बनेगी? अभिभावक स्वाभाविक ही ऐसा नहीं चाहते इसलिए वे बड़ी शिद्दत के साथ उसके पति की तलाश में लग जाते हैं-जिससे उसकी आगे भी देखभाल होती रहे, भले ही लड़का उनकी अपेक्षा के अनुरूप न भी मिल पाए।

पुरुषों के सामने फिर भी कुछ विकल्प होते हैं। अगर उसे उसकी या उसके परिवार की अपेक्षाओं के अनुरूप लड़की नहीं मिलती दिखाई देती तो वह किसी भी लड़की से विवाह करने के लिए मजबूर नहीं होता-वह विवाह नहीं भी करता तो उसके पास नौकरी होती है और वह उसके बल पर जीवन गुज़ार सकता है। उसको लेकर सिर्फ एक ही समस्या पेश आ सकती है:बिना बच्चों के वंश नहीं चल सकेगा! अब लड़के के लिए भी समय गुज़रता जा रहा है और विवाह में देर हो रही है इसलिए काफी समय गुज़र जाने के बाद और कई कोशिशों के बाद लड़के के अभिभावक उपलब्ध लड़कियों में से सबसे उपयुक्त लड़की का चुनाव कर लेते हैं:हो सकता है कि वे एक काली या साँवली लड़की चुन लें, थोड़ी मोटी भी चल सकती है, हो सकता है वह लड़के से कम पढ़ी-लिखी हो या उनकी आशानुरूप बहुत प्रतिष्ठित परिवार से न आती हो।

यह कोरी कल्पना की उड़ान नहीं है! मैं ऐसी माँओं से मिल चुका हूँ जिन्होंने कई उम्मीदवारों को जांचा परखा और हालांकि उन्हें कोई पसंद नहीं आया, उन्होंने सोचा कि यह लड़की बहुत सुंदर तो नहीं है; चलो, कुछ और लड़कियां देख लेते हैं, अगर कोई बेहतर रिश्ता नहीं मिल पाता तो इसे ही स्वीकार कर लेंगे। तो शुरू से ही आप उसे पसंद नहीं कर रहे हैं। अब ऐसी लड़की आप ले आएंगे तो बाद में आपके परिवार में उसकी क्या स्थिति होगी आप कल्पना कर सकते हैं! अगर उसमें एक छोटा सा भी अवगुण हुआ तो परिवार में हर कोई यही कहेगा कि देखा, मैं जानता था, हमें इसे नहीं चुनना था।

अगर स्पष्ट कहा जाए तो इसका अर्थ यह होता है कि सभी अपनी हताशा में इस बात की चिंता नहीं करते कि किसके साथ विवाह हो रहा है, इतना ही काफी है कि वह एक पुरुष हो जो एक महिला की देखभाल कर सके या एक महिला हो जो वंश चलाने के लिए बच्चे पैदा कर सके और उन्हें ठीक से पाल सके। आखिर इसके अलावा महिला का उपयोग ही क्या है? खाना बनाओ, सफाई करो और बच्चे पैदा करो। क्या यहाँ समाज अपना दर्शनीय चेहरा नहीं दिखा रहा है?

एक ऐसी महिला की परिवार में क्या औकात हो सकती है, जिसे बार-बार अस्वीकार किया गया हो और बेहतर विकल्प न मिल पाने के कारण जिसके साथ मजबूरी में विवाह किया गया हो और वह भी सिर्फ इसलिए कि वह आपके वंश को बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करे! कितनी शानदार और महान व्यवस्था है यह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) की परंपरा! आप क्या सोचते हैं?

Leave a Comment