कल मैंने ज़िक्र किया था कि किसी पारंपरिक भारतीय विवाह में दूल्हा और दुल्हन ज़्यादातर अपने सोफ़े पर या दो कुर्सियों पर अगल-बगल बहुत औपचारिक ढंग से बैठे रहते हैं। जी हाँ, कोई हंसी-मज़ाक नहीं, खिलखिलाना नहीं या चेहरे पर विवाह की खुशी की कोई चमक नहीं बल्कि काफी गंभीर मुद्रा, जैसे किसी अजनबी के साथ बैठे हों और कुछ देर बाद दोनों अपनी-अपनी राह चल देने वाले हों। इसलिए विवाह में आने वाले पश्चिमी मेहमान आखिर यह प्रश्न पूछ ही बैठते हैं:
7) क्या यह विवाह अरेंज्ड मैरेज है?
इसके साथ ही अगला सवाल
8) फिर क्या वे एक-दूसरे को जानते ही नहीं हैं?
मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि पश्चिमी लोगों की नज़र में यह भारतीय विवाह का एक बहुत रोचक पहलू है क्योंकि यह उनकी संस्कृति में संभव ही नहीं है कि विवाह का प्रेम के अतिरिक्त भी कोई और कारण हो! वे अरेंज्ड मैरेज की इस प्रथा के विषय में बिल्कुल अनभिज्ञ होते हैं और समझ नहीं पाते कि कैसे आर्थिक रूप से एक स्थिर परिवार का व्यक्ति, अच्छा खासा यूनिवर्सिटी में पढ़ा-लिखा व्यक्ति एक ऐसी लड़की या लड़के से विवाह कर सकते हैं, जिसे उनके माता-पिता ने उसके लिए पसंद किया हो।
लेकिन दरअसल वास्तविकता यही है कि भारत में अधिकतर विवाह आज भी इसी तरह अरेंज्ड होते हैं अनुमान लगाया जा सकता है कि जी हाँ, यह भी एक अरेंज्ड मैरेज ही है।
इसका मतलब यह भी हो सकता है कि उन्होंने एक-दूसरे को देखा भी न हो लेकिन उन्हें एक-दूसरे को देखने की ज़रुरत भी नहीं है। हर रूढ़िवादी (परंपरागत) परिवार में यह आज भी संभव है कि दूल्हा और दुल्हन एक दूसरे के सिर्फ अभिभावकों को जानते हों। थोड़ा आधुनिक परिवारों में दोनों को आपस में मिलने और बात करने की सुविधा प्रदान की जाती है। इस मुलाक़ात के बाद उनके पास एक तरह का वीटो होता है कि वे चाहें तो विवाह से मना कर दें। इसका अर्थ यह है कि वे किसी लड़के या लड़की को 'ना' कह दें और इसका कोई बुरा नहीं मानता।
कुछ बच्चे एक-दूसरे का फोन नंबर ले लेते हैं और विवाह की तैयारियों तक आपस में संपर्क बनाए रखते हैं, जिससे ताजिंदगी साथ रहने की शुरुआत से पहले एक दूसरे को बेहतर ढंग से जान सकें।
प्रेमविवाह भी होते हैं मगर उन विवाहों के समारोह उतने विशाल पैमाने पर नहीं किए जाते क्योंकि अक्सर दोनों परिवार उस विवाह के पक्षधर नहीं होते। कुछ युवा अपने परिवार द्वारा त्याग दिये जाते हैं क्योंकि उन्होंने परिवार को धता बताकर मनमर्जी से अपना साथी चुन लिया होता है। अगर अभिभावकों के विचार से मंगेतर उपयुक्त नहीं है तो वे कोई विवाह समारोह आयोजित करने से या तो इंकार कर देते हैं या बेमन से कोई छोटा-मोटा कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जिससे उसका ज़्यादा प्रचार न हो। वे दरअसल इस विवाह के कारण अपने आप को समाज के सामने लज्जित सा महसूस करते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए था।
इसलिए इस तरह होने वाले बहुत से विवाहों को आजकल 'लव-कम-अरेंज्ड मैरेज' कहने का चलन शुरू हो चुका है। ये ऐसे दंपति होते हैं, जो प्यार में पड़ गए और अपने अभिभावकों से कहने की हिम्मत जुटा पाए और वे अभिभावक अपने बच्चों की इच्छा का आदर करते हुए विवाह को समाज द्वारा स्वीकृत परंपरागत पद्धति से 'अरेंज' करने का दिखावा करने के लिए राज़ी हो गए। और स्वाभाविक ही, दंपति भी इस बात का दिखावा करते रहेंगे कि वे एक दूसरे को नहीं जानते, विशेषकर एक-दूसरे के प्रेमी की तरह नहीं जानते।
अब कुछ भारतीय इस बात पर नाहक प्रतिवाद करेंगे कि यह पूरी तरह सच नहीं है-लेकिन उन्हें यह देखना चाहिए कि एक तरफ, जहां बड़े शहरों और महानगरों में ऐसे सुखी प्रेमविवाह बहुत होते हैं, छोटे शहरों और गावों में आज भी परंपरा और रूढ़ियों का अनुसरण और पालन जारी है। और परंपरा यह अपेक्षा करती है कि विवाह अरेंज्ड हो!
तो भले ही आप अपवादस्वरूप होने वाले ऐसे किसी विवाह समारोह में शामिल हों रहे हों पर आप यह बात नोटिस नहीं कर पाएंगे क्योंकि वे उसके अरेंज्ड होने का त्रुटिहीन नाटक और दिखावा कर सकते हैं और इसका भी कि वे एक दूसरे को नहीं जानते।
आप पूछ सकते हैं, मगर उनकी भावनाओं का क्या? लेकिन वह एक अलग कहानी है और उसे मैं अगले सप्ताह आपके सामने प्रस्तुत करूंगा।
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