आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) में तनाव, दुख और अस्वीकृति-25 अप्रैल 2012

विवाह

कल मैंने आयोजित विवाहों की सफलता के बारे में लिखा था और ज़िक्र किया था कि आयोजित विवाह भारतीय संस्कृति और समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे पूर्णरूपेण उचित हैं और कुछ लोग उन्हें एक भयानक और बेहूदा विचार मानते हैं। व्यक्तिगत रूप से कोई कुछ भी कहे मगर मैंने अपने अब तक के जीवन में यह अनुभव किया है कि ये विवाह परिवारों को अत्यधिक तनाव, परेशानियाँ और दुख पहुंचाते हैं। मैंने सोचा कि इनके बारे में कुछ विस्तार से लिखूँ।

आजकल विवाहों के दो प्रचलित तरीके हैं। पहला है प्रेम/आयोजित विवाह जो इस तरह घटित होता है: एक लड़का एक लड़की को पसंद करता है या उससे प्रेम करता है और उससे विवाह करना चाहता है। अगर वह समझता है कि उसके माता-पिता खुले विचारों के हैं और उनमें हिम्मत भी है तो वह उन्हें उस लड़की के बारे में बताता है। अगर उसके अभिभावक आधुनिक विचार रखते हैं तो वे उस लड़की के माता-पिता से संपर्क करते हैं, उन्हें बताते हैं कि उनके बच्चे आपस में प्रेम करते हैं इसलिए क्यों न हम उनका विवाह करा दें। अगर लड़की के माता-पिता राजी हो जाते हैं तो दोनों परिवार मिलकर विवाह को ‘आयोजित’ कर देते हैं और लोगों को यह प्रतीत होता है कि विवाह बिल्कुल उचित ढंग से ‘आयोजित’ हुआ है। मुझे लगता है यह वह तरीका है जिसमें सबसे कम समस्याएं आती हैं-बशर्ते लड़की के माता-पिता भी राजी हों।

विवाह का दूसरा तरीका जो आजकल चलन में है उसे आयोजित/प्रेम विवाह कहा जा सकता है। इस तरीके में माता-पिता लड़के और लड़की का विवाह आयोजित करके उन्हें आपस में मिलने की छूट दे देते हैं। वे आपस में बातचीत करते हैं, कभी-कभी डेटिंग कर लेते हैं, फोन पर बातें करते हैं और उनका प्रेम परवान चढ़ने लगता है। यह समय बढ़कर एक साल तक भी हो सकता है, जैसे अगर एक अभी पढ़ाई कर रहा हो और उसे विवाह से पहले पूर्ण करना चाहता हो। दोनों जानते हैं कि किससे उसका विवाह निश्चित रूप से होने वाला है, तो फिर आपस में प्रेम भी क्यों न कर लिया जाए?

यह ऊपरी तौर पर बड़ा अच्छा लगता है मगर इसमें समस्या है। वास्तव में जीवन-साथी, जिसके साथ विवाह को आयोजित किया जाना है, उसकी तलाश को लेकर समस्या पेश आती है। यह वाकई बहुत मुश्किल है, खासकर परंपरागत परिवारों में, कि साथी ऐसा हो जो सारे परिवार की दृष्टि में उपयुक्त भी हो। लड़के लड़कियां पेशेवर फोटोग्राफरों के स्टूडियो के चक्कर लगाते हैं, जो दावा करते हैं कि वे विवाह-पूर्व फोटोग्राफी में प्रवीण हैं। वहाँ, पूरे मेकअप में और बेहतरीन वस्त्रों में फोटो-सेशन्स किए जाते हैं जिससे कुछ सर्वांग-सुंदर फोटो लिए जा सकें जिन्हें बाद में दूसरे 10-20 परिवारों को भेजा जाता है। फिर यह फोटो पर निर्भर है कि वह दूसरी पार्टी को मना ले या निराश कर दे।

लेकिन आखिर फोटो से आप कितना जान पाएंगे? वे लड़के या लड़की को छोटे से छोटा कारण बताकर अस्वीकृत कर सकते हैं, जैसे रंग, चेहरा-मोहरा या देहयष्टि। फोटो की सहायता से आप उनके चरित्र के बारे में कुछ भी नहीं जान सकते। आप ऊपरी सुंदरता तो परख सकते हैं मगर आंतरिक, मन की सुंदरता या कुरूपता का पता उससे नहीं चल सकता। क्या आप उस दुख और निराशा का अनुमान लगा सकते हैं जब 20-20 जगह फोटो भेजने के बाद कोई प्रत्युत्तर प्राप्त न हो, या सिर्फ एकाध जगह से जवाब आए?

जिन्हें फोटो पसंद आती है वे उनसे संपर्क करते हैं और ‘पात्र’ को देखना चाहते हैं, सजीव और आमने-सामने। वे मिलने आते हैं जिससे होने वाले सास-ससुर लड़के या लड़की को देख सकें। लड़की से चाय लाने के लिए कहा जाता है, जिससे वे देख सकें कि लड़की की चाल कैसी है या वह लंगड़ी-लूली तो नहीं है। अच्छा-खासा इंटरव्यू लिया जाता है जिसमें जवाब की अर्थवत्ता के अलावा उसकी अदायगी, शब्दों का उच्चारण और लड़की तुतला तो नहीं रही है इन सब बातों की जांच की जाती है। सबसे लोकप्रिय और आम जुमला होता है, ‘फोटो में वह अलग लग रही/रहा है।’ वे दावा करते हैं या आरोप लगाते हैं कि फोटो में लड़का या लड़की गोरा या गोरी है या सुंदर है, मगर वास्तविकता में कुछ और ही है। एक और इंकार, एक और अपमान, एक और जख्म। लड़की दुखी होती है, लड़का दुखी होता है, माँ-बाप दुखी होते हैं मगर वे फिर से वही प्रक्रिया फिर शुरू कर देते हैं, नए उत्साह से एक नए परिवार के साथ।

अब उन्होंने लड़के या लड़की को सशरीर देख लिया है। फोटो से आगे बात बढ़ चुकी है मगर आखिर अब भी वे लड़के या लड़की को कितना जान सके? 20 मिनट की मुलाकात में? स्वीकृति या अस्वीकृति ज्यादातर देहयष्टि या बाहरी रंगरूप पर निर्भर करती है। या फिर पैसा!

कभी-कभी लड़के के माँ-बाप लड़की को पसंद कर लेते हैं, वे अपने लड़के का विवाह उससे करने के लिए तैयार होते हैं मगर पैसे का सवाल उपस्थित हो जाता है:लड़की कितना धन अपने साथ लेकर आ सकती है? क्या? सिर्फ इतना? फिर अगला अस्वीकार। परिवार के मानसिक ध्वंस की आप कल्पना करें। सब कुछ ठीक चल रहा था, उनका स्वप्न पूरा होने ही वाला था कि पता नहीं क्या हो गया! तिरस्कृत, क्योंकि उनके पास पर्याप्त धन नहीं था।

पुराने जमाने में अभिभावक तुरत-फुरत विवाह तय कर देते थे। आजकल उन्हें लगता है कि सब कुछ देख-भाल लिया जाए कि एकदम ठीक संगति बैठे। सामने वाले को वे पूरी तरह बिल्कुल नहीं जान पाते, सिर्फ अंदाज़ लगाते हैं। यह एक नौटंकी जैसा है जो अंततः सभी सम्बद्ध व्यक्तियों को पीड़ा पहुंचाता हैं। यह माँ-बाप पर एक बहुत बड़ा तनाव और बोझ है। मैंने यह प्रक्रिया सालों-साल चलती देखी है क्योंकि साथी मिलता ही नहीं। नहीं, आयोजित विवाह उचित हो ही नहीं सकते-वे बहुत अधिक दुख और अवसाद पैदा करते हैं।

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