कल मैंने आपको पूर्णतः अलग पृष्ठभूमि और संस्कृति से आए और यहाँ तक कि अलग भाषा बोलने वाले व्यक्ति के साथ संबंध स्थापित करने पर होने वाले लाभों के बारे में बताया था। हमारे सारे तर्क इस बात की तरफ इंगित करते थे कि वे भिन्नताएँ संबंधों को ज़्यादा मजबूत और स्थायी बना सकते हैं। मज़ेदार बात यह है कि यहाँ, भारत में बच्चों की शादियाँ करते समय लोग इसके ठीक विपरीत रवैया अपनाते हैं: वे अपने युवाओं के विवाह न सिर्फ अपनी जाति में बल्कि अपनी ही उपजाति में तय करते हैं। स्वाभाविक ही, वे मानते हैं कि उनके बच्चे के, होने वाले जीवन-साथी का लालन-पालन भी उनके बच्चे की तरह ही हुआ होगा इसलिए वे एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और उनके विवाह के सफल होने की संभावना अधिक रहेगी।
इस विचार के पीछे स्थित मूल इच्छा आसानी के साथ समझ में आती है। जब आप अपनी बेटी का विवाह किसी अजनबी के साथ करते हैं तो चाहते हैं कि वह किसी ऐसे घर में जाए, जिसका परिवेश और माहौल आपके घर जैसा हो, जहां पूरा परिवार उसी तरह सोचता-विचारता हो जैसा कि आप सोचते हैं, जहां आपकी संस्कृति और रीति-रिवाजों का पालन होता हो। इसी तरह जब कोई नई लड़की विवाह के बाद आपके घर रहने आती हैं तो आप चाहते हैं कि, जहां तक संभव हो, पहले से उसे आपके घर के रीति-रिवाजों का ज्ञान हो। तो अगर आप अपने बच्चों की अरेंज्ड मैरेज करना चाहते हैं तो निश्चय ही यह एक संतुलित और तर्कसंगत विचार है।
समस्या यह है कि यह तरीका ही अपने आप में एक बीमार व्यवस्था पर आधारित है, जो लोगों को जाति प्रथा में जकड़ती है और उन्हें उच्च और निम्न वर्ग के बीच विभाजित करती है। लोग सिर्फ इस बात पर ही विश्वास नहीं करते कि एक ही जाति के लोगों के घरों में एक जैसा सांस्कृतिक वातावरण होता है-वे यह भी मानते हैं कि नीची जातियों के लोग गंदे (घृणास्पद) होते हैं, उनके सामने उस जाति के लोगों की कोई औकात नहीं है और उस जाति में विवाह संबंध स्थापित करने पर उनका लड़का या लड़की किसी भी हालत में सुखी नहीं हो सकते। तो, यह सिर्फ अपने बच्चे के लिए किसी समझदार जीवन-साथी के साथ सुखमय जीवन की कामना ही नहीं है बल्कि यह कुछ दूसरे मनुष्यों के प्रति आपकी घृणा का खुला प्रदर्शन भी है।
फिर यह बात भी पूरे दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि एक ही जाति या उपजाति के लोगों के बीच बेहतर आपसी समझ होती है या उनके घरों में एक जैसी संस्कृति पाई जाती है और इसलिए हर हाल में दोनों एक-दूसरे के अनुरूप होते ही हैं। इसके विपरीत, हर व्यक्ति का एक अलग व्यक्तित्व होता है और हर परिवार में लोगों के अपने-अपने अलग जीवनानुभावों के अनुसार हर एक में अलग दृष्टिकोण का विकास हो सकता है, जो उस परिवार के माहौल को भी प्रभावित और परिवर्तित करता है और घर के बढ़ते बच्चों के चरित्र और नज़रिये पर भी असर डालता है, जिससे ये बच्चे भी अपना अलग व्यक्तित्व विकसित करते हैं।
जब आप किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करते हैं कि वह आपके जैसा हो तो आप नव विवाहित दंपति से आपस में दो स्वतंत्र व्यक्तियों के रूप में मधुर संबंध स्थापित करने की स्वतन्त्रता छीन लेते हैं, जो दो अलग-अलग संस्कृतियों से आए दंपति को सहज प्राप्त होती है। आप बदलने के लिए तैयार नहीं हैं, किसी नई बात के प्रति सहिष्णु नहीं हैं, इसके बावजूद कि इसका अर्थ आपके लड़के या लड़की को सुखी और दीर्घजीवी संबंध स्थापित करने की दिशा में ज़्यादा सुविधाएं मुहैया कराना हो सकता है!
तो मेरे प्रिय भारतीय मित्रों, भले ही आप यह बात न मानें कि जाति प्रथा एक अमानवीय परंपरा है और जल्द से जल्द इसका खात्मा किया जाना चाहिए, लेकिन कम से कम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ न करें कि एक ही जाति या उपजाति का होना इस बात की कोई जमानत (गारंटी) नहीं हैं कि आपकी लड़की या लड़के का वैवाहिक जीवन सुखी और दीर्घजीवी सिद्ध होगा। अगर वे किसी दूसरी जाति में अपने प्रियकर से विवाह करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा करने से रोकने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर लें। हो सकता है कि उन्होंने किसी ऐसे व्यक्ति को खोज लिया हो, जिसे पहली नज़र में आप पहचान न पा रहे हों मगर जो भविष्य में आपके दिल के भी करीब साबित हो! नए के प्रति खुला रवैया अपनाएं और मुझे विश्वास है कि उस, अलग नज़र आने वाले व्यक्ति में आपको बहुत से नए और आकर्षक गुण नज़र आएँगे!
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