विवाहित दंपति खुशी के मुखौटे के पीछे अपनी समस्याओं को छिपाते हैं – 6 मई 2013

विवाह

पिछले हफ्ते मैंने महिला और उसके सास-ससुर, परिवार और पति के बीच चलने वाली खींच-तान के बारे में लिखा था। मेरा मुख्य विषय था महिला और पुरुष के बीच होने वाले झगड़े और समस्याएं जो, मेरे विचार में, आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) की सीधी उपज होते हैं। समस्याएं ही समस्याएं हैं, मगर जब आप उनसे मिलेंगे तो कभी जान नहीं पाएंगे कि वे आपस में अकसर लड़ते-झगड़ते रहते हैं और एक दूसरे का मुंह तक देखना पसंद नहीं करते। वे अपने दांपत्य जीवन पर सुंदर आवरण चढ़ा लेते हैं और दूसरों के सामने एक आदर्श दंपति की तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन यह सिर्फ भारतीय समस्या नहीं है।

आदर्श और सुमधुर संबंध हर एक का सपना होता है और अधिकांश लोग यह चाहते हैं कि दूसरे उनके बारे में कम से कम इतना विश्वास करें कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं भी है तो भी उनके संबंध सामान्य हैं और कोई संगीन समस्या नहीं है। यही कारण है कि लोग अपने जानने-पहचानने वालों और दोस्तों के सामने भी एक झूठी तस्वीर पेश करने की ओर प्रवृत्त होते हैं। अगर दूसरे उनके विवाह की असलियत जान जाएँ तो इससे उनका अहं आहत होता है। इसीलिए सिर्फ पड़ोसी ही बंद कमरों के पीछे वास्तव में क्या चल रहा है, यह जान पाते हैं।

पश्चिम में भी मैंने देखा है कि लोग भीतर से गहरे दुख में डूबे होने के बाद भी झूठा दिखावा करते हैं और चेहरे पर खुशी का आवरण चढ़ाए रहते हैं। जोड़ों और पति-पत्नियों के बीच भी यह होता है लेकिन भारत के मुकाबले पश्चिम में समस्याओं को सहन करते रहने की बहुत छोटी सी हद है, खासकर युवाओं में। मेरी उम्र के मेरे कुछ मित्र हैं, जो बताते हैं कि उनके माँ-बाप जीवन भर लड़ते-झगड़ते रहे हैं, मगर आज भी एक साथ रहते हैं। उसके बाद वाली पीढ़ी यह नहीं करती! वे देख चुके हैं कि उनके माँ-बाप जीवन भर कितना दुखी रहे हैं और इसलिए यही फैसला करते हैं कि यह गलती वे नहीं दोहराएँगे! जब कोई समस्या पेश आती है तो उसका हल निकालो। अगर उनका कोई हल नज़र नहीं आता तो कुछ अलग सा करके देखो, संबंध तोड़ लो, तलाक ले लो।

खासकर ऐसे पश्चिमी दंपति जिनके बच्चे नहीं हैं यह निर्णय भारतीय दंपतियों के मुकाबले अधिक आसानी से ले पाते हैं। भारत में तलाक एक प्रकार का कलंक है। समाज यह घोषित कर देता है कि क्योंकि आप विवाहित थे और अब आपने तलाक लेने का फैसला किया है तो निश्चित ही आप एक बहुत बुरे इंसान हैं। तलाक एक भयावह स्वप्न की तरह होता है और कोई दूसरा उसे समझने के लिए तैयार ही नहीं होता, यह उनके सोच के बाहर की बात होती है। भले ही पति शराबी, जुआरी हो महिलाएं विवाह में बनी रहती हैं। यह बात भी है कि बहुत सी महिलाओं के सामने इसके अलावा कोई चारा नहीं होता क्योंकि उनके पास अपनी खुद की कोई आमदनी नहीं होती और वे इतनी आश्वस्त नहीं होतीं कि अकेले दम पर जीवन गुज़ार सकें। लेकिन जिनके सामने कोई आर्थिक परेशानी नहीं होती वे भी तलाक का कदम नहीं उठा पातीं और विवाह में बने रहने में ही अपनी भलाई समझती हैं और आशा करती रहती हैं कि शायद भविष्य में सब कुछ ठीक हो जाएगा।

जो लोग अपने जीवन-साथी के साथ इस बारे में चर्चा करने मेरे पास आए हैं उनकी बातें सुनकर अजीब लगता है। मैं जानता हूँ कि वे अपने विवाह से कितने परेशान हैं लेकिन वे अपने पति या पत्नी के सामने भी अपना चेहरा मुसकुराता, हँसता बनाए रखते हैं। यही वह झूठ है, मुखौटा है जो वे ओढ़े रहते हैं और जो मेरी समझ से बाहर है।

आप अपने जीवन को बदलने की कोशिश छोडकर क्यों उसे बरबाद होने देंगे और क्यों दुख में जिएंगे? सिर्फ इस खातिर कि समाज के सामने आपके सम्मान में कमी न आए? क्या आप नहीं समझते कि आपकी व्यक्तिगत खुशी, समाज क्या ठीक समझता है, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण है? अपने मुखौटे को काटकर फेंक दीजिये और अपने जीवन की परेशानियों का हल खोजने की शुरुआत कीजिये।

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