निचले वर्ग की भारतीय लड़कियां-दहेज जुटाना मुश्किल और तलाक पाना असंभव! – 1 मई, 2013

विवाह

पिछले कुछ दिनों से मैं आयोजित विवाहों की (अरेंज्ड मैरेज) विभिन्न समस्याओं के बारे में लिखता आ रहा हूँ। अपनी कुछ प्रविष्टियों को दोबारा पढ़ने पर मुझे लगा कि इनसे कोई सोच सकता है कि मैं समाज के एक खास वर्ग के बारे में ही लिख रहा हूँ। पश्चिम के लोग, जिन्हें आयोजित विवाह का विचार एक नयी बात लगता है, सोच सकते हैं कि सिर्फ उस खास वर्ग के लोग ही समस्याओं के बावजूद अपने विवाह में बंधे रहते होंगे। वे नहीं जानते कि असफल विवाहों कि समस्या समाज के सभी वर्गों में समान रूप से पाई जाती है और सभी वर्गों के लोग अपने दुर्भाग्य को नियति मानकर भुगतते रहते हैं मगर नाता तोड़कर तलाक नहीं लेते। आप निचले वर्ग, मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग के लोगों से पूछिए, आयोजित विवाह सफल भले न हो मगर पति-पत्नी शादीशुदा ही बने रहेंगे। यह बहुत तार्किक है, अगर आप समाज की संरचना पर गौर करें। मैं बताता हूँ कि क्यों।

हम उनसे शुरू करते हैं जिन्हें आप उनकी आर्थिक स्थिति के अनुरूप निचला वर्ग कहेंगे। उनकी आमदनी अधिक नहीं होती, निश्चित रूप से खर्चीले आयोजित विवाह सम्पन्न करने के लिए वे पर्याप्त बचत कर पाने में असमर्थ होते हैं। वे रोज़ मजदूरी करते हैं ताकि इतना कमा सकें कि खुद और बाल-बच्चों को खाना खिला सकें, उनके कपड़े-लत्ते खरीद सकें और उन्हें किसी तरह बड़ा कर सकें। बड़े आयोजनों के लिए वे दूसरों पर निर्भर होते हैं।

लड़कियों की शादी तय होने पर जहां कहीं भी उन्हें सहायता की उम्मीद होती है वे हाथ फैलाते हैं। उदार मना लोग उन्हें कुछ रुपया देते हैं, चैरिटी संस्थाएं भी मदद करती हैं जिससे वे दूल्हे को देने के लिए दहेज का जुगाड़ कर सकें और कुछ रुपये विवाह के आयोजन और पार्टी के लिए भी उपलब्ध हो सके। वे पूरा प्रयास करते हैं कि पर्याप्त धन इकट्ठा हो जाए लेकिन अगर पूरा नहीं पड़ता तो वे अपने रिश्तेदारों से उधार लेते हैं, या किसी मित्र या किसी साहूकार से लेते हैं, जो रुपये वापसी के समय मूल के साथ ब्याज भी वसूल करता है।

रुपया इकट्ठा करने के इस आवश्यक मगर बेहद कष्टकर काम के चलते ज्यादातर लोग लड़के की कामना करते हैं। अगर उनकी कई लड़कियां हैं तो सभी के विवाह का इंतज़ाम उन्हें करना पड़ता है और ऊपर से दहेज भी देना पड़ता है।

पैसा आने पर और उचित कीमत पर दुल्हा मिल जाने पर लड़की की शादी कर दी जाती है। यह बहुत कम उम्र में भी हो सकता है, खासकर गरीब परिवारों में। तेरह और चौदह साल की लड़कियों को भी ब्याह दिया जाता है जबकि 18 साल की लड़कियों के ब्याह गैरकानूनी हैं। गांवों में हर साल अनगिनत बाल-विवाह होते हैं। ये लड़कियां इतनी परिपक्व नहीं होतीं कि अपने लिए कोई निर्णय ले सकें और जैसा उनके अभिभावक चाहते हैं वही करती हैं। उसने अब तक का पूरा जीवन अपने अभिभावकों के कहे अनुसार गुज़ारा है इसलिए विवाह के बाद अगर उसे अपना पति पसंद नहीं आता तो वह यह बात भी अपने अभिभावकों से कहती हैं। और वे उसे समझाते हुए कहते हैं कि उसे स्वीकार करो, उसके साथ सामंजस्य बिठाओ और किसी भी हालत में अपनी गृहस्थी की गाड़ी को पटरी से उतरने मत दो।

लड़की की हालत की कल्पना कीजिये। उसने कोई काम नहीं सीखा है और अगर उसे अपने दम पर जीना है तो या तो उसे भीख मांगनी होगी या कड़ी मेहनत वाला काम करना होगा। उसके माँ-बाप के लिए उसे वापस अपने पास रखना मुश्किल है। प्रेम के वशीभूत वे ऐसा कर भी लें तो उस लड़की की आत्मग्लानि की कल्पना कीजिये। वह न सिर्फ अपने पिता का कहा न मानने की दोषी है बल्कि उनकी आर्थिक तंगी को और बढ़ाने का कारण भी बन गई है! अगर उसका कोई बच्चा हो चुका है तो और भी परेशानी हो सकती है।

लड़के के लिए यानी नए दूल्हे के लिए भी परिस्थिति बहुत आसान नहीं होती। अगर उसे लगता है कि उसकी पत्नी उसके परिवार के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है और उसके साथ भी लड़ने का कोई न कोई बहाना ढूंढती रहती है तो उसे क्या करना चाहिए? अगर उनके बीच तलाक हो जाता है तो लोग उस पर हंस सकते हैं कि वह एक औरत को भी अपने साथ नहीं रख पाया! और फिर क्या वह अपनी पत्नी के प्रति कोई ज़िम्मेदारी महसूस न करने वाला गैरजिम्मेदार पति है? इन सब बातों के कारण वे साथ ही रहे आते हैं, चाहे उनके बीच विवाद के कई मुद्दे हों, रोज़ लड़ाइयाँ ही क्यों न होती हों। वे दुखी रहते हैं, झगड़ा करते रहते हैं, अक्सर सबके सामने, क्योंकि गरीब होने के कारण सब छोटे-छोटे घरों में आसपास ही रहते हैं। फिर भी जीवन में परिवर्तन के लिए कुछ भी नहीं करते।

%d bloggers like this:
Skip to toolbar