भारत में तलाक की नीची दर-क्या आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) की सफलता प्रदर्शित करती है?-24 अप्रैल 2012

विवाह

आज अक्षय तृतीया है, भारत में एक धार्मिक दिन। यह कहा जाता है कि आज आप जो भी कर्म करते हैं वह व्यर्थ नहीं जाता। आप जो काम आज शुरू करेंगे वह सफल होता है और जो आज आपको प्राप्त होता है वह सदा आपके पास बना रहता है। इसलिए आज के दिन लोग ज़्यादा से ज़्यादा सोना खरीदते हैं और सुनारों की चाँदी हो जाती है और शादियाँ भी बहुत होती हैं। अधिकतर विवाह आयोजित विवाह होते हैं क्योंकि यही भारत में विवाहों का सबसे सामान्य तरीका है। आज मैं जिस प्रश्न पर विचार करने जा रहा हूँ वह यह है कि क्या ये विवाह सफल भी होते हैं?

पश्चिमी लोगों के मन में तुरंत यह उत्तर गूंज उठता होगा कि "नहीं! जब आप किसी अजनबी के साथ जीवन बिताने के लिए मजबूर कर दिये जाते हैं तो ऐसे विवाह कभी सफल नहीं हो सकते! यह बहुत पुरातनपंथी तरीका है!" वास्तविकता यह है कि भारत में विवाह का आज भी यह सबसे आम तरीका है, अधिकतर विवाह आयोजित ही होते हैं और बच्चे, भले ही वे 30 साल के परिपक्व वयस्क हों, जब ऐसे आयोजित विवाह के लिए राज़ी होते हैं तो उसे बिल्कुल गलत नहीं मानते, न दुखी होते हैं न यह समझते हैं कि उनके साथ कोई जबरदस्ती हो रही है।

वे अपने अभिभावकों से इसके अतिरिक्त कोई और उम्मीद भी नहीं रखते। यहाँ यह बिल्कुल सामान्य बात होती है, उनके आसपास यही होता है, सारे जानने-पहचानने वालों के विवाह ऐसे ही हुए होते हैं या होने वाले होते हैं। बहुत कम लोग उन्हें ऐसे दिखाई देते हैं जिन्होंने किसी दूसरी जाति में या प्रेम करने के बाद अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ विवाह किया होता है। बच्चे दरअसल उस दिन का इंतज़ार करते हैं जब उनके माँ-बाप उनसे कहते हैं कि बेटा, हमने तुम्हारे लिए जीवन-साथी ढूंढ लिया है और अब तैयार हो जाओ। यह संस्कृति का हिस्सा है। कई बार हम लोग मज़ाक में कहते हैं कि यह तरीका बच्चों को अपने लिए जीवन-साथी ढूंढने की परेशानियों और व्यर्थ तनावों से दूर रखता है। यह अभिभावकों की ज़िम्मेदारी है और अगर सब कुछ समयानुसार सुचारु रूप से नहीं होता तो दोष बच्चों का नहीं उनके अभिभावकों का माना जाता है।

लेकिन आप यह नहीं कह सकते कि एक भी आयोजित विवाह सफल नहीं होता। बहुत से ऐसे विवाह सफल भी होते हैं और कई सफलता की कहानियाँ भी प्रचलित हैं। खुद मैंने ऐसे अनगिनत दंपति देखे हैं, जिनमें मेरे माता-पिता शामिल हैं, जिन्होंने एक साथ एक सुखद जीवन व्यतीत किया। लेकिन यह तो है ही कि जब दो अजनबी आपस में मिलते हैं और विवाह रचाते हैं तो सफलता एक दूसरे के साथ तालमेल, समझौतों और आपसी सहिष्णुता पर निर्भर करती है। पुरुष को भी यह करना पड़ता है मगर अधिकतर मामलों में तालमेल, समझौते और उदारता की ज़िम्मेदारी बेचारी स्त्रियों पर ही आयद होती है।

मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? भारतीय संस्कृति और समाज में यह बिल्कुल आम बात है कि विवाह के बाद महिलाओं को अपने माँ-बाप का घर, जहां वह पली-बढ़ी, छोड़कर अपने पति और उसके परिवार के साथ रहना होता है। अर्थात, वह अपने पति के साथ एक नए वातावरण में प्रवेश करती है, उसके सास-ससुर, नया शहर और बिल्कुल भिन्न परिवेश। उसके पिछले जीवन से यहाँ हर बात अप्रत्याशित, अविचारित और पूरी तरह अलग हो सकती है। स्वाभाविक ही पुरुषों को भी थोड़ा-बहुत तालमेल तो बिठाना ही पड़ता है-आखिर उसके साथ एक महिला तो होती ही है, मगर लड़की को ज़्यादा समझौते करने पड़ते हैं और सारे परिवार के साथ तालमेल बिठाना होता है। अगर वह ऐसा कठिन काम कर पाती है और पति भी अपना हिस्सा ठीक-ठाक निभा ले जाता है तो विवाह सफल हो जाते हैं। और भारत में तलाक की दर यही साबित करती है कि आज भी यहाँ अधिकतर विवाह सफल ही होते हैं।

लेकिन इस स्थान पर आकर आपको यह प्रश्न पूछना चाहिए:आखिर सफलता का पैमाना क्या हो? क्या तलाक न होने का मतलब विवाह की सफलता माना जाए या विवाह की सफलता उसे माना जाए जहां दो व्यक्तियों के बीच मधुर संबंध हों, उनके जीवन में सुसंगति हो? जिन्हें 'सफल आयोजित विवाह' प्रचारित किया जा रहा है क्या उनमें 100% मामलों में पति-पत्नी सुखद जीवन बिता रहे हैं? आप बेझिझक मानकर चल सकते हैं कि ऐसा नहीं हो रहा है। आंकड़ों में एक विवाह सफल नज़र आ सकता है क्योंकि उनका तलाक नहीं हुआ, उन्होंने कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं लगाए और क्योंकि वे एक ही छत के नीचे रह रहे हैं। लेकिन अक्सर मैं देखता हूँ उनमें कोई तालमेल और प्रसन्नता नहीं होती। ये विवाह सिर्फ इसलिए चल रहे हैं क्योंकि समाज द्वारा खींची गई मर्यादा की उस रेखा को पार करने का साहस किसी में नहीं है जिसे लांघने पर उन्हें यह कहना पड़ेगा, 'मैं तुम्हारे साथ अब नहीं रह सकता/सकती'। यह बेहद मुश्किल काम है।

मैंने कई दंपतियों को देखा है जो दिन-रात लड़ते रहते हैं और एक-दूसरे का साथ उन्हें बिल्कुल नहीं सुहाता। इसके बावजूद वे साथ रहते हैं और उन्होंने अपने कटु जीवन को स्वीकार कर लिया है। क्यों? तलाक आज भी इस समाज में इज्ज़त पर लगा काला धब्बा माना जाता है। सामाजिक प्रतिष्ठा के खो जाने का डर ही उनकी लड़ाइयों को बंद कमरों में महदूद रखता है, जबकि बाहर वे अपने सुखी और संतुष्ट चेहरे लिए समाज में विचरते हैं। कुछ महीनों बाद ही समस्याएं शुरू हो जाती हैं मगर वे सुखी और प्रेममय दाम्पत्य जीवन का नाटक खेलते रहते हैं। लोगों के लिए वे सफलता पूर्वक विवाहित दंपति हैं लेकिन जब वे अकेले होते हैं तब लड़ते हुए ईमानदारी से कहते हैं: 'मेरे घर में तुम्हारे लिए जगह है, मेरे जीवन में है मगर मेरे दिल में तुम्हारी कोई जगह नहीं.' क्या आप इसे वास्तव में एक सफल विवाह मानेंगे?

ऐसी स्थितियाँ पश्चिम में भी मौजूद हैं। मुझे याद है मेरे एक जर्मन मित्र ने मुझे बताया था कि उसके माता-पिता 40 साल से आपस में लड़ते हुए जीवन गुज़ार रहे हैं और कई बार उन्होंने तलाक लेने के बारे में सोचा। अब वे 80 साल के आसपास हैं और उसी तरह तनाव में लड़ते हुए एक साथ रह रहे हैं। अलग होने के बारे में वे कोई निर्णय नहीं ले पाए कि लोग क्या कहेंगे? पश्चिम में भी सामाजिक प्रतिष्ठा आज भी एक मुद्दा बना हुआ है। हालांकि यह ज्यादातर अब बुजुर्ग लोगों में ही विद्यमान है। आज की पीढ़ी अब इतनी छोटी सी बात के लिए जीवन भर दुख नहीं उठा सकती।

भारत में भी पुराने समय में विवाहों की सफलता दर आज के मुकाबले में कहीं ज़्यादा थी। या कहा जाए कि तलाक के मामले पहले कम थे, कैसे भी इसे देखें, बात वही है। इसका एक और कारण यह है कि आजकल विवाह की उम्र भी ज़्यादा होती है। बाहरी दुनिया के प्रभाव में और शिक्षा के कारण समाज में आए परिवर्तनों के चलते आजकल पुरुष और महिलाएं दोनों गलत बातों को बर्दाश्त नहीं करते और अगर कोई बात उन्हें पसंद नहीं है तो प्रतिवाद करते हैं और आसानी से समझौते नहीं करते। अपने अभिभावकों की मर्ज़ी से उन्होंने विवाह भले ही कर लिया हो लेकिन ऐसा लगता है कि आजकल ज़्यादा लोग यह कहने का साहस दिखा पा रहे हैं कि वे अब साथ नहीं रहना चाहते। अधिक लोग अब यह मानते हैं कि उनकी और उनके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा उनके व्यक्तिगत जीवन की खुशी से बड़ी नहीं है। और अगर वे इस प्रेमविहीन विवाह में बंधे रहे तो अपनी खुशी और मानसिक शांति खो देंगे। यही कारण है कि आजकल पहले के मुकाबले अधिक संख्या में तलाक हो रहे हैं।

मैं यह नहीं कहूँगा कि आयोजित विवाह सफल हो ही नहीं सकते और यह कि अगर उनके अभिभावकों ने उनके जीवन-साथी का चुनाव किया है तो वे साथ रह ही नहीं सकते। लेकिन मैं इतना अवश्य कहूँगा कि यह विवाह का एक पुराना, दकियानूसी तरीका है जो आज के समय में प्रेम के स्थान पर अक्सर कष्ट लेकर आता है। अगले कुछ दिन मैं आयोजित विवाहों पर कुछ विस्तार से लिखता रहूँगा।

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