तलाक न होना विवाह की सफलता का पैमाना है या प्रेमपूर्ण वैवाहिक संबंध? – 30 अक्टूबर 2012

विवाह

बाहर से आने वाले विदेशियों के लिए भारत में होने वाले तयशुदा विवाह (अरेंज्ड मैरेज) यहाँ की संस्कृति को जानने का एक महत्वपूर्ण जरिया होते हैं। इस बार आयुर्वेद योग के अवकाश के समय सहभागियों के साथ इस विषय पर कई चर्चाएँ और विचार-विमर्श हुए। उन लोगों के बहुत सारे सवाल थे, वे कल्पना ही नहीं कर पाते कि आज के आधुनिक युग में ऐसा हो सकता है और हम उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं कि यह कैसे संभव हो पाता है- और कई बार नहीं भी हो पाता।

मैंने पहले ही कहा है कि पश्चिम में विवाह के आंकड़े असफल विवाहों की बढ़ती संख्या की तरफ इशारा करते हैं। जबकि भारत में ये आंकड़े विवाह की बेहतर सफलता-दर दर्शाते हैं। सवाल यह है कि विवाह की सफलता का पैमाना क्या हो। अगर यह महज तलाक न होना है, तो भारत अधिक सफल कहा जा सकता है। लेकिन अगर विवाहित जोड़ों के बीच आपसी प्रेम और सुखमय जीवन को सफलता का पैमाना बना दिया जाए तो स्थिति कुछ और ही दिखाई देगी। जब कोई मेहमान इस बात पर आश्चर्य करता है कि कैसे इतने लोग बिना आपसी प्रेम के साथ रह पाते हैं तो मैं उन्हें जर्मनी के कुछ वृद्ध लोगों का उदाहरण देता हूँ। मैंने एक जर्मन दंपति के बारे में सुना था जो 80 साल से अधिक की उम्र के हैं और उन्होंने वैवाहिक जीवन के 50 साल आपस में लड़ते हुए और कटुता में गुज़ार दिये लेकिन तलाक नहीं लिया। तो अगर भारत में भी ऐसा होता है तो इसमें आश्चर्य क्या है।

हम इसे अपने चारों ओर होता हुआ देखते आए हैं। तयशुदा शादियाँ खुशी, उल्लास और धूम धड़ाके के साथ शुरू होती है। औरत और मर्द दोनों के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। वे उसे नहीं जानते जिससे मिलन होना है और बड़े उत्तेजित होते हैं कि वह कैसा होगा जिसके साथ उन्हें सारा जीवन व्यतीत करना है। एक-दूसरे के साथ यह उनका पहला मौका होता है, वे हनीमून के लिए चल देते हैं और उनके शारीरिक संपर्क में बहुत उत्कटता होती है। यह बड़ा स्वप्निल समय है और वे उसका पूरा लुत्फ उठाते हैं।

मगर धीरे-धीरे वे यथार्थ के धरातल पर आ गिरते हैं। पत्नी अपने सास-ससुर के घर में रहना सीखती है। पति और पत्नी एक दूसरे की पसंद-नापसंद, प्राथमिकताओं और एक दूसरे के स्वभाव और सोचने समझने की प्रक्रियाओं के अंतर को जानने-समझने लगते हैं। और अगर उनमें कोई गंभीर अंतर हुआ तो उससे निपटना बड़ा मुश्किल हो जाता है। जो खुशकिस्मत हैं उनके बीच ऐसे गंभीर मतभेद कम ही होते हैं और जो उतने खुशनसीब नहीं हैं वे समस्याओं में घिर जाते हैं। यह लॉटरी जैसा है-आप खुशकिस्मत हैं या बदकिस्मत, 50-50 प्रतिशत मौका है! जैसा मैंने कहा कि इस तरह के विवाह से आप अपने साथी के जीवन में तो प्रवेश पा सकते हैं मगर यह निश्चित नहीं होता कि आप उसके दिल में भी जगह पा ही जाएंगे! उसे तय नहीं किया जा सकता, अरेंज नहीं किया जा सकता!

मैं मानता हूँ कि हर देश में और हर संस्कृतियों में कई शादियाँ ऐसी होती हैं जो सफल नहीं हो पातीं। लेकिन मेरी नज़र में तयशुदा विवाह उन जोड़ों के लिए दुख ही पैदा करते हैं। फिर भारत में इतनी अधिक संख्या में सफल विवाहों का राज़ क्या है? आंकड़े तो यही कहते हैं! सच्चाई यह है कि हमारे देश में और हमारे समाज में तलाक एक घिनौना शब्द है, इसे सामाजिक मान्यता नहीं है, इसे बहुत बुरा माना जाता है। लोग तलाक लेने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते।

वे दुखी हैं, वे एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, आपस में लड़ते हैं, एक दूसरे से दूर भागते हैं, लेकिन अंततः एक-दूसरे के पास वापस लौट आने के लिए अभिशप्त हैं । वे एक ही छत के नीचे साथ रहते हैं और सबसे बड़ी बात इस कटुता को लोगों से छुपाने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन वे तलाक नहीं लेते। बहुत कम लोग तलाक लेने का मन बना पाते हैं। बाकी लोग उसी तकलीफ और मानसिक घुटन में जीते रहते हैं। वे रोज़ बरोज मरते हुए रिश्ते की लाश उठाए जीते रहते हैं और ‘सफल विवाहों’ की संख्या बढ़ाने में अपना योगदान देते हैं!

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