परी कथाओं जैसे भारतीय विवाह परन्तु वर और वधू की मिट्टी पलीद – 27 नवंबर 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

कल मैंने भारतीय विवाह के पूरे माहौल पर एक टिप्पणी लिखी थी, इस कारण पश्चिमी लोगों द्वारा भारतीय विवाहों के विषय में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों की सूची बीच में ही रह गई। इस सूची को आज आगे बढ़ाते हुए मैं वर और वधू के, जो वास्तव में इस आयोजन के मुख्य नायक होते हैं, कुछ करीब जाना चाहूँगा।

3) कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने पर: हे भगवान्, ये घोड़ा यहाँ कहाँ से आ गया!

जी हाँ, यह घोड़ा ही है और उसके ऊपर विराजमान शहजादा हमारा दूल्हा है! भारतीय परीकथाओं जैसे विवाह समारोह आयोजित करना पसंद करते हैं, जिसमें दूल्हा साफा, पगड़ी बांधकर, कमर में तलवार धारण किए सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर अपनी शहजादी को लेने आता है! वे आज के राजकुमार और राजकुमारी हैं, देवी-देवता हैं!

4) शादी हाल में: अच्छा तो यह है दूल्हा! मगर दुल्हन कहाँ है?

स्टेज के पीछे या शायद ब्यूटी पार्लर में अपना मेकअप कराते हुए, अपनी बहनों और सहेलियों के साथ हंसी-ठट्ठा करते हुए।

5) कुछ समय बाद: इतनी देर बाद भी दुल्हन कहीं नज़र नहीं आ रही है-क्या वह आएगी ही नहीं? कुछ लोग वापस भी जा रहे हैं, अब तो! ऐसा तो नहीं कि वह अपने विवाह में ही शामिल न हो?

परेशान न हों, वह आएगी-थोड़ी मिठाई और खाइये, या फिर यह कोल्डड्रिंक लीजिए! बढ़िया है न!

6) कुछ और समय गुजरने के बाद: आखिर दुल्हन आ ही गई! अब क्या कार्यक्रम होगा? दंपति बहुत खुश नज़र नहीं आ रहे! कोई हंसी मज़ाक नहीं, कोई उत्तेजना नहीं! वे वहाँ मूर्तियों की तरह खड़े हैं-वे नीचे आकर मेहमानों से बात भी नहीं करेंगे क्या?

मैंने आपको बताया ना, कि दूल्हा और दुल्हन आज राजकुमार और राजकुमारी हैं या देवी और देवता! वे आज सामान्य बातचीत नहीं करेंगे! वे आज बिल्कुल औपचारिक व्यवहार करेंगे और वही करेंगे, जो उन्हें इस वक़्त करना ज़रूरी है: एक दूसरे के गले में फूलमाला डालेंगे फिर अपने अपने राजसिंहासन पर बैठ जाएंगे और फोटो खिंचवाएंगे। वे आज ज़्यादा बातें नहीं कर सकते और न ही खिलखिलाकर हंस सकते हैं। उन्हें आज शर्मीली मुस्कुराहट ओढ़े रहना होगा, फोटो में गंभीर बना रहना होगा! दूल्हा-दुल्हन के लिए यही भारतीय शिष्टाचार है!

जी हाँ, आजकल फोटो बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। फोटो सभी मेहमानों के साथ अलग-अलग समूहों में खिंचवाए जाते हैं। जब मेहमान भोजन करके विदा ले चुके होते हैं तब कहीं जाकर दूल्हा और दुल्हन अपने परिवार वालों के साथ बैठकर भोजन कर पाते हैं।

विवाह का मुख्य विधि-विधान अब शुरू होता है। आम तौर पर इसमें सिर्फ बहुत करीबी रिश्तेदार और परिवार वाले ही शामिल होते हैं। दरअसल अब असली विवाह शुरू होना है, जिसमें लंबा और हिंदुओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण कर्मकांड किया जाता है। इसके पहले हुआ प्रीतिभोज सिर्फ पारंपरिक सामाजिक व्यवहार की खातिर किया जाता है। इसमें आपने मेहमानों का स्वागत किया, इज्ज़त के साथ बिठाया, गीत-संगीत और नाच-गानों द्वारा उनका मनोरंजन किया और सुस्वादु भोजन कराया लेकिन एक बार उसके सम्पन्न हो जाने के बाद असली विवाह समारोह शुरू होता है और सारी रात चलता रहता है।

फिर सबेरे दुल्हन का परिवार अपनी लड़की अथवा बहन या भतीजी को उसके नए घर के लिए बिदा करता है। यह आंसुओं से सराबोर कार्यक्रम होता है, क्योंकि दुल्हन अब घर-परिवार छोड़कर अपना नया संसार बसाने जा रही है। दूल्हा अब उसे अपने घर ले जाएगा।

फिर कहानी खतम और पैसा हजम! वे दोनों हमेशा-हमेशा के लिए सुख के साथ रहने लगे…