मैं आयोजित विवाहों के बारे में बात कर रहा था। आजकल के आधुनिक आयोजित विवाह तभी सम्पन्न होते हैं जब लड़के-लड़कियां प्रौढ़ हो चुके होते हैं अर्थात जब अपने जीवन साथी और अपने भविष्य के बारे में उनके सपने परिपक्व हो चुके होते हैं और एक तरह का विचार उनके मन में पक्का हो चुका होता है कि वे अपने जीवन साथी में क्या खूबियाँ देखना चाहेंगे। और क्योंकि उनका परिवार उनका विवाह तय करता है अधिकतर मामलों में उसे स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई और विकल्प नहीं होता। उन्हें अपने सपनों के साथ समझौता करना पड़ता है क्योंकि और कोई चारा नहीं होता। कुछ लोग तो खुश होते हैं मगर कई इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं। और जब यथार्थ उनके सामने अपनी पूरी कटुता के साथ उपस्थित होता है तो एक राजकुमार या राजकुमारी की कल्पना, जो उनके जीवन में तरह तरह के रंग भरती थी, टूटकर बिखर जाती है और यह बहुत तकलीफदेह होता है।
आधुनिक आयोजित शादियों में यौन संबंध भी एक दूसरे को ठीक तरह से जाने बगैर ही शुरू हो जाते हैं। भावनात्मक संबंध अभी विकसित नहीं हुए होते। वैसे इसमें वक़्त भी लगता है मगर महज यौन संबंध बनाने के रोमांच का भी अपना सम्मोहन होता है। मैं कई लोगों को जानता हूँ जो इसका बेसब्री के साथ इंतज़ार किया करते थे। कल्पना करें कि जो व्यक्ति 25-30 साल का हो जाने पर भी यौन संबंध नहीं बना पाया हो वह इसे लेकर कितना उत्साहित होता होगा। और वे जानते हैं कि आज की रात वे ऐसा करने वाले हैं। उनके मित्र उनसे मज़ाक करते हैं, तरह तरह के चुट्कुले सुनाते हैं और परिवार वाले बाकायदा उनके लिए बहुत सारी तैयारियां करते हैं और यह रात उनकी ‘पहली रात’ या ‘सुहाग रात’ कहलाती है।
हो सकता है, पुराने जमाने में दृश्य कुछ अलग रहा हो। हमने अपने दादा जी की पीढ़ी के बारे में सुना है कि उस वक़्त भी इसी तरह शादियाँ तय हुआ करती थीं लेकिन उस वक़्त शादियाँ इतनी कम उम्र में हुआ करती थीं कि यौन विषयों के बारे में सोचना भी मुश्किल था। उनकी शादी हुई, साथ रहने लगे, साथ खेलते हुए बड़े हुए। शारीरिक विकास के साथ उनका मानसिक विकास भी होता गया और उनके बीच प्रेम भी बढ्ने लगा। उनकी सभी अपेक्षाएँ, स्वप्न और विचार आसमान में नहीं बने। उनका राजकुमार या राजकुमारी किसी आसमान से नहीं उतरे; उन्होंने उसे यथार्थ में अपने सामने, खुली आँखों देखा। इसलिए उनके सपने टूटने के अवसर बहुत कम आए क्योंकि वे किसी एक पर पहले से ही केंद्रित थे। वे इस प्रकार बड़े हुए कि एक दूसरे से अलग होने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। उनके संबंध और प्रेम का आधार बहुत मजबूत था इसलिए वह सारा जीवन बना रहेगा इसमें कोई शक नहीं हो सकता था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं बाल विवाह की वकालत कर रहा हूँ। मैं आज के और पुराने जमाने के आयोजित विवाहों के बीच सिर्फ तुलना कर रहा हूँ।
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