कल मैं बात कर रहा था, भारत में संबंधों को आयोजित या प्रायोजित करने की प्रक्रिया के संबंध में। पश्चिमी संस्कृति में भी मैं कुछ समानताएँ देखता हूँ। पश्चिम में विवाह परिवार द्वारा आयोजित नहीं किए जाते यह ठीक है। लेकिन मैंने बताया था कि आयोजित विवाह में भावनात्मक संबंध स्थापित होने से पहले ही शारीरिक संबंध शुरू हो जाते हैं। उनके खुले रवैये के चलते आधुनिक पश्चिमी समाज में हम देखते हैं कि लड़का और लड़की सार्वजनिक स्थानों पर, रेस्टरेंटों में, डिस्को या पार्टियों में सहज ही मिलते रहते हैं। पहले आँखें मिलती हैं, फिर कुछ बातें होती हैं, फिर हाथों पर हाथ और होठों पर होठ आ जाते हैं। एक दूसरे की सांसें अपने चेहरों पर महसूस करते हुए कब वे कमरे के एकांत में, बिस्तर पर होते हैं पता ही नहीं चल पाता। लेकिन अभी भी भावनात्मक संबंध पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता। भारत और पश्चिमी समाज की इस समानता की तरफ मैं इंगित कर रहा था। अंतर यह है कि पश्चिम में आप खुद चुनाव करते हैं, चुनाव परिवार की पसंद नहीं होता।
मैं यह लिख ही रहा हूँ कि रमोना ने कहा, ‘मान लो कि भाग्य खराब है और आपका आयोजित विवाह हुआ है और सुहागरात के दिन आप अपने भावी जीवन साथी से मिलते हैं और पाते हैं कि, अरे यार, यह तो मुझसे बिल्कुल मेल नहीं खाता, हम दोनों ही एक दूसरे के लायक नहीं हैं! फिर?’
तब मैंने ध्यान दिलाया कि एक तरह से यह पश्चिम में भी होता है: जब आप नशे में होते हैं। हम अक्सर ऐसे लोगों की कहानियाँ सुनते हैं जो सुबह किसी अजनबी औरत या मर्द की बगल में सोते हुए उठते हैं। दोनों में समानता यही है कि तब तक कोई भावनात्मक संबंध स्थापित नहीं हुआ होता। यहाँ यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि संबंध बनाने के तरीके दोनों जगह अलग-अलग हैं। पश्चिम में संबंध हैं, फिर विवाह हैं जो गहरे आत्मिक लगाव के बाद सम्पन्न हुए हैं। भारत में भी आप ऐसा देख सकते हैं। सभी दंपति सुहागरात के दिन पहली बार मिलते हैं, यह बात ठीक नहीं है। कई आधुनिक अभिभावक बच्चों को अपने भावी जीवनसाथी के साथ मिलने की इजाज़त ही नहीं देते बल्कि उन्हें प्रोत्साहित भी करते हैं जिससे वे एक दूसरे को बेहतर ढंग से समझ सकें। फिर वे उनकी राय भी जानना चाहते हैं। लंबे समय तक सुखद संबंधों के लिए दिलों का मिलना बहुत ज़रूरी है।
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