पुराने जमाने में आयोजित विवाह और अब – 15 जनवरी 2010

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मैं जानता हूँ कि पिछले साल भी मैंने आयोजित विवाहों के बारे में लिखा था और उसमें मैंने विस्तार से बताया था कि पिछले समय में उनका स्वरूप क्या था। जो मैंने पहले लिखा था उस पर मैं आज भी विश्वास करता हूँ कि आयोजित विवाहों के पीछे मूल विचार गलत नहीं है: प्रेम समय के साथ परवान चढ़ता है। तो आज जो हो रहा है और जो पहले हुआ करता था उसमें सिर्फ एक बड़ा अंतर है।

पुराने जमाने में जब लोग गांवों में रहा करते थे, वे बच्चे के पैदा होते ही यह निर्णय ले लेते थे कि भविष्य में उसका जीवन-साथी कौन होगा। फिर वे दोनों बच्चे साथ-साथ बड़े होते थे और इस दौरान प्रेम का अंकुरण और उसका विकास होता रहता था। तब कुछ समय बाद दोनों का विवाह हो जाता था। उनका प्रेम तो धीरे धीरे परवान चढ़ता ही था मगर उनके अभिभावकों ने त्वचा के रंग, सुंदरता या और कुछ देख-समझकर तो उनका विवाह तय नहीं किया था जैसा कि आजकल होता है। आज की तरह यह अपमानजनक प्रक्रिया तब नहीं थी। और मेरा दृढ़ विश्वास है कि वास्तव में प्रेम का विकास हो सकता है।

अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि क्या इस तरह बच्चों का विवाह तय करना उनकी आज़ादी छीन लेना नहीं है। जी हाँ, यह बात अवश्य है जिसे मैं बिल्कुल स्वीकार नहीं कर सकता। यह भी कि वे बच्चों की इस आज़ादी के बारे मेँ बिल्कुल मौन थे जैसे यह कोई विचार ही न हो! यह वाकई भयानक है। लेकिन मैं यहाँ अपनी बात को इस बिन्दु पर केंद्रित कर रहा हूँ कि आज विवाह की उस बुरी व्यवस्था में कितने नए आयाम जोड़ दिये गए हैं और उसे बद से बदतर बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई है। आज वधू का चुनाव एक ब्यूटी कॉन्टेस्ट जैसे आयोजन से कितना मेल खाता है, यह देखने की बात है और यह बहुत दुखद है। कल मैंने शारीरिक निकटता और अहं रहित समर्पण का ज़िक्र किया था, सोचता हूँ अगले कुछ दिन इन बातों पर कुछ न कुछ लिखता रहूँगा।

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