पिछले दिनों मैं भारत की शादियों के बारे में बात कर रहा था कि कैसे अभिभावक और परिवार मिलकर बच्चों के लिए जीवन साथी का चुनाव करते हैं। जातियों और उपजातियों का मिलना ज़रूरी है यह भी मैं पहले ही बता चुका हूँ और यह भी कि आर्थिक स्थिति कैसे अधिकतर मामलों में मुख्य भूमिका निभाती है।
फिर एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है: उनकी कुंडली मिलती है या नहीं? क्या उनका भावी जीवन सुखद होगा या उनके ग्रहों में कोई दोष है? मेरा विश्वास है कि कोई भी भविष्य के बारे में कुछ नहीं बता सकता और खासकर दो लोगों के, जिन्होंने एक दूसरे को कभी देखा तक नहीं, संयुक्त भविष्य के बारे में तो बिल्कुल नहीं। कौन जान सकता है कि वे एक दूसरे को किस तरह प्रभावित करेंगे, वे एक दूसरे के लिए क्या महसूस करेंगे और उनके संयुक्त जीवन पर समाज का क्या असर होगा?
लेकिन इसमें मुख्य समस्या यह है कि दोनों के पास कोई विकल्प नहीं होता। कुछ अभिभावक अपने बच्चों की राय लेते हैं और कुछ उनकी राय या उनकी इच्छा का सम्मान भी करते हैं लेकिन सब नहीं। आज भी कई रूढ़िवादी परिवार हैं जिनके बच्चे शादी के दिन ही अपने जीवन साथी को पहली बार देख पाते हैं।
हमने ऐसे भी प्रकरण देखे हैं जहां सहोदर भाइयों के विवाह सहोदर बहनों से कर दिये जाते हैं। एक लड़का और एक लड़की का विवाह हो गया और अभिभावकों ने देखा कि उनका विवाह सफल है तो लड़के के भाई का विवाह लड़की की बहन से कर दिया जाता है। यह आसान भी है, उन्हें लड़की या लड़के की खोज दोबारा नहीं करनी पड़ती और परिवार ज़्यादा निकट महसूस करता है।
मैं कई बार चकित रह जाता हूँ कि कैसे विभिन्न संस्कृतियाँ अलग-अलग परंपराओं और रीति-रिवाजों का विकास कर लेती हैं। भले ही वे आज दकियानूसी, अनावश्यक और मूर्खतापूर्ण लगें मगर वे सदियों बाद भी जीवित हैं।
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