तयशुदा विवाह या प्रेम विवाह? परंपरा और आज़ादी के बीच फंसी एक पीढ़ी – 31 अक्टूबर 2012

विवाह

कल मैंने बताया था की बहुत से तयशुदा विवाह दरअसल असफल विवाह होते हैं मगर उन्हें सफल मान लिया जाता है क्योंकि दंपति तलाक नहीं लेते। आज मैंने सोचा कि अपने ब्लॉग का कुछ समय और स्थान इस बात की चर्चा को समर्पित करूँ कि ऐसा नहीं है और कुछ नई पीढ़ी की विवाह संबंधी इस दुविधा पर भी बात होगी।

यह पीढ़ी आधुनिक भारत में बड़ी हो रही है। उनके पास अपनी सारी परंपराओं और आदतों सहित इस पुरातन संस्कृति का अतीत है। वे आज बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय संस्कृतियों द्वारा बुरी तरह प्रभावित हैं जिन्हें आधुनिक मीडिया टीवी, इंटरनेट के अलावा आधुनिक शिक्षा के जरिये उन तक पहुंचा रहा है। वैश्वीकरण हर तरफ छा गया है।

यह चारों तरफ से घिरी हुई पीढ़ी है। उनके अभिभावकों के पास दुनिया से संपर्क बना सकने की ऐसी सुविधा नहीं थी। ये युवा सिर्फ अपनी पुरानी परंपराएँ जानते हैं। ये युवा महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करते हुए कई तरह के संबंध स्थापित करने के लिए मजबूर हैं। यह उनका पहला मौका हो सकता है, पहली प्रेमासक्ति, पहला प्रेम, विवाह के विषय में सोचें, उसके पहले का उत्तेजक संबंध।

लेकिन जब विवाह की बात आती है तो वे अपने माता-पिता का और पूर्वजों द्वारा सदियों से पोषित परंपराओं का सम्मान करना चाहते हैं। वे बगावत नहीं करना चाहते और यहाँ तककि वे तयशुदा विवाहों में कोई बुराई भी नहीं देखते। यही उनके अभिभावकों ने किया था और वे तो खुश हैं! वे अपने बड़ों-बुज़ुर्गों की इच्छाओं का सम्मान करना चाहते हैं और इस तरह उनके द्वारा चयनित अपनी ही जाति की लड़की या लड़के से विवाह करने के लिए राजी हो जाते हैं। आखिर उनके अभिभावकों की यही तो सबसे बड़ी अभिलाषा थी कि उनका विवाह ठीक तरीके से कर दिया जाए।

और फिर समस्याएं शुरू हो जाती हैं। उनमें आपसी तालमेल नहीं बैठ पाता और फिर वे अपने अभिभावकों को दोष देते हैं। यह अच्छा बहाना होता है:आपने उसे पसंद किया था, मैंने नहीं! यह मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है! लेकिन अपनी पत्नी के साथ जीवन तो आपको बिताना है! आपके माँ-बाप को नहीं!

लेकिन नहीं, यह भी पूरी तरह सच नहीं है। क्योंकि पत्नी अपने सास-ससुर के साथ रहती है इसलिए उसे भी उनके साथ काफी समय बिताना होता है। और हर असफल विवाह के पीछे, जो मेरी नज़र से गुजरते हैं, यह समस्या भी एक मुख्य वजह होती है। विवाह से पहले यह युवती आज़ादी का स्वाद चख चुकी है। वह पैंट पहनकर विश्वविद्यालय गई है, सलवार-कमीज़ में वह सुविधा महसूस करती है और अब अपने नए घर में सास-ससुर उससे अपेक्षा कर रहे हैं कि वह साड़ी पहने। इससे भी बुरी बात, अपने ससुर या और किसी भी बुजुर्ग के सामने अपना चेहरा ढांककर रखे। वह अपने सास-ससुर का आदर करना चाहती है और घर के नियमों का पालन करना चाहती है लेकिन ऐसा करने पर उसकी खुशी, उसकी आज़ादी मारी जाती है। जब भी वह अपनी माँ के यहाँ जाएगी वह अपनी मर्ज़ी के कपड़े पहनेगी, जैसे जींस, सलवार सूट, कुछ भी! जब वह वापस अपने घर आएगी फिर अपने बहू के रोल में आ जाएगी।

प्रिय अभिभावकों: मैं जानता हूँ कि आप अपने बच्चों को खुश देखना चाहते हैं। आपका समय अलग था और उनका आज का समय बिल्कुल अलग है। उन पर दबाव डालकर उन्हें आपकी मर्ज़ी का विवाह करने पर मजबूर न करें। यह मानसिक बोझ उन पर न डालें कि वे आपकी इच्छा का पालन करते हुए विवाह न करें तो वे आपको और आपके परिवार को कलंकित करते हैं। अगर वे विवाह करके सुखी नहीं होते तो आप भी खुश नहीं होंगे। आपको यह समझना होगा कि आपके बच्चे अलग माहौल में बड़े हुए हैं और उनके विवाह भी आपके विवाह से अलग तरह के होंगे।

प्रिय सास-ससुरों: अगर आपके घर में बहू है तो उसे इस बात की आज़ादी दें कि वह अपना आप न खोए और जैसी वह है, वही बनी रहे। उसे सम्मान दें और वह आपको सम्मान देगी। अगर आप उसे नियमों के कटघरे में बंद कर देंगे कि वह क्या पहने और कैसा व्यवहार करे तो वह बेहतर जीवन की आशा में आपके बेटे को लेकर अलग रहना पसंद करेगी। और यह उसके लिए गलत नहीं होगा क्योंकि आप उसे अपने तरीके से रहने का दबाव डाल रहे हैं। यही कारण है कि परिवार टूट रहे हैं। इसका दोष उन पर न डालें। ऐसा अपने घर में न होने दें।

प्रिय अविवाहित युवा मित्रों: अपने जीवन का निर्णय स्वयं करें। अपने विवाह की ज़िम्मेदारी खुद आपको उठानी होगी। आप अपने जीवन के लिए अपने अभिभावकों को हमेशा दोष नहीं दे सकते।

मैं नहीं समझता कि अगली पीढ़ी को इस समस्या का सामना करना पड़ेगा। वे इससे भी ज़्यादा आधुनिक होंगे और ज़्यादा अपने बारे में सोचेंगे। जब आज की पीढ़ी अभिभावक बनेगी तब वे भी उन परेशानियों से बचे रहना चाहेंगे जो उन्होंने अपने अभिभावकों के हाथों भोगी थीं। वे नहीं चाहेंगे कि अपने बच्चों के विवाह की ज़िम्मेदारी या उस विवाह की असफलता का दोष अपने सिर पर लें। और उनके बच्चे ऐसा स्वीकार भी नहीं करेंगे।

हो सकता है कि मेरे माँ-बाप के जीवन काल में तयशुदा विवाह अधिक कारगर और युक्तिसंगत थे। आज के समय में निश्चय ही वे ठीक नहीं हैं। भविष्य में स्पष्ट हो जाएगा कि जिसके साथ प्रेम है उसके साथ विवाह एक बेहतर विकल्प है। ये विवाह विवाह को परिपाटियों, रस्मों और करारनामों से आगे ले जाते हैं। हमारी युवा पीढ़ी अभी परिवर्तन के बीचोंबीच स्थित है लेकिन आने वाली पीढ़ी प्रेम के पथ पर अधिक आसानी के साथ और अधिक विश्वास के साथ अपने कदम बढ़ाएगी।

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