आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) और उसका मूल विचार – 21 नवंबर 2008

मैं संबंध बनाने के भारत के पारंपरिक तरीके यानी आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) पर कुछ बातें कहना चाहता हूँ। उसके पीछे का विचार क्या है? आप संबंध और प्रेम को पनपने की जगह देना चाहते हैं। दोनों के बीच प्रेम तो है ही नहीं क्योंकि वे एक दूसरे को जानते ही नहीं हैं। प्रेम ऐसे में संभव ही कैसे है? लेकिन वे ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करते हैं जिसमें प्रेम पनप सकता है।

मैं अपने एक मित्र से उसके विवाह के चार माह बाद मिला। मैंने उससे पूछा:"आप कैसे हैं? आपकी पत्नी कैसी हैं? और आपका वैवाहिक जीवन कैसा गुज़र रहा है?" उसने कहा:"बढ़िया चल रहा है। पत्नी भी ठीक है। हमारा शारीरिक संबंध बन गया है और भावनात्मक संबंध भी शनैः-शनैः विकसित हो जाएगा." मैं उसके ईमानदार और स्पष्ट जवाब से बड़ा खुश हुआ। यह सच है, भावनात्मक संबंध बनने में थोड़ा वक़्त लगता है मगर शारीरिक संबंध बन जाने के पश्चात वह विकसित अवश्य हो सकता है। शारीरिक संबंध बनाना तुलनात्मक रूप से आसान है।

अब मैं आयोजित विवाह की अपनी परिभाषा देना चाहूँगा। प्रेम किसी शर्त का मोहताज नहीं; वह किसी के साथ भी हो सकता है बशर्ते आप उसके करीब हों और आप उसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित करें। अगर दोनों इस प्रेम में समर्पित होना चाहते हैं तो उसका आधार मजबूत हो जाता है और वे उस पर जीवन भर के संबंध की इमारत खड़ी कर सकते हैं। अगर उसका मुख्य तत्व अर्थात, बिना-शर्त प्रेम, सध जाता है तो फिर जीवन भर कोई समस्या पेश नहीं आती। लेकिन अगर उन्होंने एक दूसरे के बारे में बहुत सी कल्पनाएँ सँजो रखी हों या बहुत सी अपेक्षाएँ हों और कई शर्तें लगा रखी हों तो फिर आयोजित विवाह के इस रास्ते पर दो कदम चलना भी मुश्किल है। अगर यह इस तरह सध जाता है तो अच्छा है लेकिन ऐसा भी होता है कि वह चल नहीं पाता। मैं इस तरह के विवाह के समर्थन में नहीं हूँ। लोग कहते हैं कि यह एक तरह का जुआ है और मैं एक बार मज़ाक में किसी से कह रहा था कि यह एक संगठित अपराध है।

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