शास्त्र बच्चों व वयस्को में जादू और भूत के भय को जन्म देते हैं – 17 जनवरी 2013

जादू

कुछ दिन पहले मैं एक धार्मिक हिन्दू से बात कर रहा था । हमारी चर्चा का विषय धर्म, परमेश्वर और अलग अलग मान्यताओं के बारे में था कि इसमें भिन्नता कैसे हो सकती है। बातचीत के दौरान उसके एक प्रश्न पर मैं विचारों के समुन्दर में गोते लगाने लगा, इसलिये मैं चाहता हूं कि इसके बारे में आपको बताऊं। उसका प्रश्न था ‘यदि आप परमेश्वर पर विश्वास करते है तो आप भूत और जादू में भी यकीन करते होंगे‘।

यह बहुत ही हास्यास्पद बात है कि ऐसे प्रश्न का जवाब क्या हो सकता है? अगर आप पश्चिम (पश्चिमी देशों) में रह रहे हैं और किसी आध्यात्मिक या गूढ़ दृश्य में शामिल नहीं हैं तो आपको यह लग सकता है कि यह बात किसी नास्तिक द्वारा किसी आस्तिक का मजाक बनाने के लिये ही कही गयी है। पश्चिम में भूतों और जादू की बातों को सामान्यतः हास्यापद तरीके से ही लिया जाता है। वहां पर भूत, भूत की कहानियों में, जादू, परियों की कहांनियों में और आधुनिक फंतासी उपन्यासों में ही होता है। पश्चिम के किसी युवा के सामने यदि आप ‘जादू‘ शब्द बोलते हैं तो सबसे पहले उनके मन में जो छवि उभरेगी वह हैरी पॉटर की होगी। एक किताब, उपन्यास, एक फिल्म, या जो भी अवास्तविक हो और जिसे काल्पनिकता से मनोरंजन के लिये ही बनाया गया हो।

भारत में थोड़ी भिन्नता है। यह एक तथ्य है कि बेशक यहां पर जादू और उपन्यास है पर यहां पर धर्म ने लोंगो में जादू के प्रति एक ऐसा अन्धविश्वास पैदा कर दिया है कि वह वास्तव में जादू पर विश्वास करते है। वह भूत और अलौकिक शक्तियों पर विश्वास करते हैं। वे यह नही सोचते कि यह काल्पनिक है। अगर आप परमेश्वर पर विश्वास करते है तो आप भूत और जादू पर भी विश्वास करते है – बेशक शास्त्रों की सभी कहांनियो में उनके आस्तित्व की बात कही गयी है। शास्त्र तो जादू से भरा पड़ा है – एक बार मैं रमोना को शास्त्र की एक कहानी बता रहा था तो उसे हंसी आ रही थी, उसने कहा यह कहानी तो हैरी पॉटर जैसी लगती है। पश्चिम में लोग जानते है कि यह कल्पना है परन्तु यहां इसे इतिहास से जोड़कर बताया जाता है जैसे सच में ऐसा घटित हुआ हो और यहां की यह मान्यता है अगर आप चेतना के उसी स्तर पर पहुंच जाते है तो दोबारा ऐसा हो सकता है।

ऐसा नहीं है कि बच्चे ही भूत और जादू पर विश्वास करते है, बल्कि वयस्क भी मानते है नतीजतन यह डर सिर्फ बच्चों में ही नही अपितु वयस्कों में भी है। हमेशा की तरह धर्म ने लोगो में इस डर को स्थापित कर दिया है क्योकि यह डर लोगों को नियंत्रित करने में मदद करता है। भूतो की कहानियां यह भी बताती है कि ऐसे खतरे आये तो धर्म यह सलाह देता है तब अनुष्ठान व कर्मकाण्ड आदि करना चाहिए।

दुर्भाग्य से वयस्कों ने यह डर अपने बच्चों को भी सिखा दिया है। सभी देशों के बच्चे ऐसी कहांनियों से डरते है परन्तु पश्चिम में माता-पिता अपने बच्चों को प्रारम्भ से ही यह सिखाते है यह सब काल्पनिक और अवास्तविक है। हांलाकि भारत में माता-पिता अपने दरवाजो पर कोई वस्तु लटका देते है जिससे बुरा जादू प्रवेश न कर पाये और वह बच्चो को यह सिखाते है कि हमारी तकिये के नीचे एक चाकू है जिससे भूत डरते है।

जब आप अपने बच्चे को यह बताते कि भूतों के खिलाफ हमें क्या करना चाहिये, तब वास्तव में आप बच्चे को प्रोत्साहित कर रहे होते है कि भूत सच में होते है। एक भयभीत युवा किसी भी कार्य को करने से पहले यह अवश्य ध्यान देता है कि उसने इससे बचने के सारे उपाय कर लिये है या नही, क्योकि यह भय पहले से ही उत्पन्न किया गया है। आप अपने बेटे व बेटी को कर्मकाण्डों और अनुष्ठानों पर निर्भर रहना सिखा देते है, उन पादरियों और लोगो पर विश्वास करना सिखाते हैं जो जादू, भूत, राक्षस और बुरी आत्माओं के बारे में बात करते हैं।

यह तथ्य है और बताने में और भी बुरा लगता है कि उच्च शिक्षित लोग भी इस भय और भ्रम में रहते है। वे अपने बच्चों को विज्ञान व चिकित्सा के बारे में बताते है पर साथ ही वह उनमें डर भी सिखाते है। अपने बच्चों को किसी काम से रोकने के लिये वे यह सिखाते है कि यह मत करो वरना भूत आ जायेगा! वे अपने बच्चों इस बात से भयभीत करते है कि अगर वह अच्छा व्यवहार नही करेंगे तो उन्हें उस गोदाम में बन्द कर दिया जायेगा, जिसमें एक भूत रहता है। यहां तक कि वो उस भूत का एक डरावना नाम भी खोज लेते है जिससे कि वे अपने बच्चों को डरा सकें। कल ही मेरे पिता ने मुझे बताया कि उन्होंने व मेरी मां ने हमें कभी भी डराया नही। उन्होने कभी भी ऐसी धमकियों का सहारा नही लिया और यही कारण है कि हमलोग कभी भी भूत, जादू और अंधेरे से नहीं डरें।

यह दयनीय है कि आज भी लोग ऐसी बकवास बातों पर विश्वास करते हैं और अपने बच्चों को भी सिखाते हैं। ऐसी प्राचीन कहांनियों से आप एक ऐसी विकलांग पीढ़ी पैदा कर रहे है जो उनमें झिझक व अनावश्यक भय को जन्म देती है।

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