प्यार का कोई विलोम नहीं है – 7 सितंबर 2015

प्रेम

मेरे लिए प्रेम जीवन का एक प्रमुख विषय है। सदा से रहा है। वास्तव में मैं समझता हूँ कि अधिक से अधिक लोगों को अपने जीवन में प्रेम को अधिक से अधिक प्रमुखता देनी चाहिए क्योंकि उससे उन्हें लाभ हो सकता है। प्रेम पर चर्चा करने वाले लोगों यानी आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों के प्रचार के विपरीत मैं यह मानता हूँ कि प्रेम का विलोम कुछ भी नहीं है। ऐसी कोई विपरीत भावना नहीं है, जिसका अस्तित्व प्रेम की उपस्थिति में असंभव हो।

परस्पर विरोधी चीज़ें एक साथ नहीं रह सकतीं, ठीक? कोई व्यक्ति एक साथ लंबा और ठिगना नहीं हो सकता। तापमान एक साथ ठंडा और गरम नहीं हो सकता। आपके बाल एक साथ लंबे और छोटे नहीं हो सकते। इसी तरह लोग सोचते हैं कि घृणा या डर भी प्रेम के विलोम हैं। कई लोग मुझसे कहते रहते हैं: "जहाँ प्रेम होगा वहाँ घृणा नहीं हो सकती" या अगर "आपमें प्रेम का भाव है तो फिर डर के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।" मैं नहीं समझता कि ये दोनों वक्तव्य सच हैं।

मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि प्रेम दूसरी किसी भी भावना के साथ एक साथ रह सकता है! प्रेम छल के साथ रह सकता है, वह जूनून के साथ एक साथ रह सकता है। यहाँ तक कि प्रेम का अस्तित्व नापसंदगी (अरुचि) के साथ, अज्ञान या विरक्ति के साथ भी हो सकता है।

आपने भी ऊपर उल्लिखित एहसासों (भावनाओं) को प्रेम के साथ, एक साथ मौजूद देखा होगा लेकिन आप शायद कल्पना भी नहीं कर सकते कि घृणा और डर के साथ भी प्रेम अपना सहअस्तित्व बना लेता है।

क्या आपने कभी लव-हेट रिलेशनशिप नहीं देखी? क्या आपके सामने कभी भी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई, जहाँ ऐसा हुआ हो कि जिससे आप प्रेम करते हैं, उसने आपका कोई अहित किया हो? भले ही यह बहुत कम समय के लिए हुआ हो लेकिन जब आप क्रोधित या अपमानित हुए तो क्या उसमें कुछ मात्रा में घृणा भी नहीं मिली हुई थी। और उस समय, क्षण भर के लिए ही सही, क्या आपने यह नहीं सोचा कि आपके बीच प्रेम नहीं रह गया है।

इसी तरह मेरा विश्वास है कि भय के साथ भी यही होता है। वह भी एक ही समय में एक साथ मौजूद हो सकता है। आप प्रेम भी कर रहे हो सकते हैं और उसी वक़्त आपको डर भी लग रहा हो सकता है कि यदि आप कुछ ज़्यादा खुलेंगे तो पता नहीं क्या हो। क्या आपको फिर बुरा लगेगा? क्या आपकी बहुमूल्य भावनाओं का गलत इस्तेमाल कर लिया जाएगा? इससे आपके प्रेम पर कोई असर नहीं होगा लेकिन आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उसी वक़्त आपके मन में भय भी मौजूद था- एक साथ दोनों!

तो यह बहुत स्पष्ट है: जितनी शिद्दत से मेरा भरोसा है कि प्रेम है, उतनी ही शिद्दत से मेरा मानना है कि उसके साथ डर या घृणा भी मौजूद हो सकती है। और ये दोनों भी महज नैसर्गिक भावनाएँ हैं, जिन्हें हम अपने अस्तित्व का हिस्सा मान सकते हैं!

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