सुबह सबेरे मैं अपनी पत्नी की बगल में सोता हुआ उठता हूँ। मैं उसे अपनी बाहों में भर लेता हूँ, उस औरत को गले लगाता हूँ, जिससे मैं प्रेम करता हूँ, जबकि वह सो रही होती है। मैं इस पल को सँजोकर रखना चाहता हूँ और कल्पना करता हूँ कि वह भी स्वप्न में इस आलिंगन को महसूस कर रही होगी।
धीरे-धीरे उसमें हलचल होती है और उसके साथ ही हमारी छोटी परी भी, जिसे अपनी बेटी कहते हुए मैं गर्व से भर उठता हूँ, हिलना-डुलना शुरू कर देती है। अर्धनिद्रा में भी अपरा की मासूम ईर्ष्या देखने के काबिल होती है और वह माँ के ऊपर से घिसटकर हम दोनों के बीच आ जाती है। उसका एक हाथ मुझ पर होता है और दूसरा रमोना के शरीर पर। कुछ पल हम इसी तरह लेटे रहते हैं, तीन लोगों के इस प्रेमासिक्त संयुक्त आलिंगन की छुअन को महसूस करते हुए, उस अपरिभाषित प्रेम के मंजुल स्पर्श में डूबे हुए।
फिर अपरा कसमसाती है, अंगड़ाई लेती है और करवट बदलते हुए धीरे-धीरे पूरी तरह चैतन्य हो जाती है। वह बाएँ देखती है, फिर दाएँ। उसकी आँखें एक-एककर हमसे मिलती है और वह मुस्कुराती है। इस मुस्कुराहट को मैंने अपनी स्मृति में सदा सदा के लिए सुरक्षित कर रखा है!
उसका चेहरा, उसकी मुस्कुराहट, उसका स्पर्श और उसका आलिंगन। जब वह दोनों हाथ फैलाकर लिपटने के लिए आपकी तरफ दौड़ पड़ती है, जब वह आपको खेलने के लिए या उसके साथ चहलकदमी करने के लिए पुकारती है, उसकी कहानियाँ सुनने के लिए बुलाती है और थक जाने पर जब वह चाहती है कि आप उसे गोद में ले लें।
इन सभी पलों में मैं उस असाधारण प्रेम को महसूस करता हूँ, एक बच्चे के बिना शर्त प्रेम को। बिना किसी कारण के, अप्रतिबंधित और सीमा रहित। सिर्फ इसलिए कि यह मैं हूँ।
और उसके बगल में मेरी पत्नी और उसकी आँखों में मैं एक विशाल प्रेम का साक्षात्कार करता हूँ। एक दूसरे प्रकार का प्रेम मगर किसी तरह कम गरिमापूर्ण नहीं। एक महिला का प्रेम, जो पूरी अंतरंगता के साथ मुझे जानती है और जो हर तरह से, हर हालत में हमेशा और हमेशा-हमेशा के लिए मुझसे प्रेम करती रहेगी।
मैं अपने विचारों को भटकने देता हूँ और वे मेरे माता-पिता और नाना-नानी का साक्षात्कार करते हैं, जो मेरे तरीकों पर बिना किसी प्रतिवाद या आपत्ति के मुझसे प्रेम करते रहे और कर रहे हैं। मैं उनके दिखाए रास्ते से कितना भी दूर हुआ मगर उनका प्रेम मेरे लिए बना रहा। प्रेम, जो यह नहीं जानता था कि मैं क्या करता हूँ या मेरे विचार क्या हैं- प्रेम, जो महज ‘है’ और जो मेरी हर मुश्किलों में मेरे साथ मौजूद रहेगा, जिसे मैं कभी भी याद कर सकूँगा और उससे शक्ति प्राप्त कर सकूँगा।
और इस प्रेम का और उसकी शक्ति का विस्तार मैं अपने भाइयों, पूर्णेन्दु और यशेंदु में पाता हूँ, जो हमेशा मेरे साथ बने रहते हैं। एक और किस्म के प्रेम के स्तम्भ। मजबूत और अटूट विश्वास से भरपूर।
इन सबके साथ अपनी बहन की और उसके प्रेम की नाज़ुक स्मृति। शाश्वत चिरंतन और हमेशा अपूर्व अनोखी।
अंत में मित्रों का प्रेम, जो नजदीक हों या दूर, दुनिया के किसी भी कोने में हों, मेरा सहारा हैं, मेरी चिंता करते हैं।
अब बताइए कि मैं अपने आपको, जो सुबह उठते ही इतने सारे प्रेम के बीच जागता हो, दुनिया का सबसे सुखी इंसान क्यों न महसूस करूँ?
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