प्रेम के साथ जीवन गुजारें या भोग-विलास में – 16 जुलाई 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

मैंने पहले ही इस समस्या की ओर अपने पाठकों का ध्यान खींचा था और आज उस पर विस्तार से प्रकाश डालने का इरादा कर रहा हूँ। सभी को और विशेषकर अभिभावकों को यह निर्णय लेना ही पड़ता है कि उनके जीवन में ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है: प्रेम या ऐश-ओ-आराम? आप क्या चुनेंगे?

स्वाभाविक ही, रोमांटिक लोग यही कहेंगे कि प्रेम ही चुनो। प्रेम का चुनाव करना वैसे भी एक आदर्श बात होगी क्योंकि ऐश-ओ-आराम कौन चाहता है? सभी प्रेम चाहते हैं! इसलिए सारे आराम और भोग-विलास भूलकर प्रेम कीजिए!

चलिये, अब इसके व्यावहारिक पहलू पर आते हैं-और यहाँ यह प्रश्न थोड़ा कठिन हो जाता है। आप आसानी से कह देते हैं कि आप प्रेम को आराम से ज़्यादा महत्व देते हैं मगर आखिर आराम शुरू किस बिन्दु से होता है? यह स्पष्ट रूप से एक आराम या सुविधा मानी जाएगी कि कोई साल में पाँच दिन किसी शानदार जगह में छुट्टी बिताने चला जाए, वह भी चार्टर्ड प्लेन में। दूसरी तरफ अधिकांश लोगों के लिए यह तय करना ही बड़ा मुश्किल है कि दिन भर में कितना समय वे काम करें। उनके लिए साल में एक या दो दिन की भी छुट्टी मिल जाए तो बहुत है। सीधा सा प्रश्न यह है कि क्या आपको सिर्फ कुछ ज़्यादा कपड़े खरीदने के लिए या अधिक हाई-टेक उपकरण खरीदने के लिए या बेहतर तकनीकी समाग्री खरीदने के लिए या ज़्यादा आरामदेह यात्रा करने के लिए ज़्यादा काम करना चाहिए? या फिर, क्या आपको कुछ कम काम करके ज़्यादा समय अपने परिवार के साथ बिताना चाहिए?

अगर आप किसी विशेष स्तर का रहन-सहन चाहते हैं तो उसे पाने के लिए आपको एक नियत समय तक काम करना होगा। अगर यह स्तर कुछ ऊंचा है तो कुछ ज़्यादा काम करना होगा। अगर आप ज़्यादा काम करेंगे तो आप अपने बच्चों और परिवार को कम वक्त दे पाएंगे। आप अपने जीवन साथी और बच्चों के साथ प्रेम करते हुए, खेलते हुए, हँसते-गाते और जीवन का आनंद लेते हुए उसी अनुपात में कम समय गुज़ार पाएंगे।

कई संबंध सिर्फ इस कारण से टूट चुके हैं कि दो में से एक साथी समझता है कि उसका साथी काम में इतना व्यस्त रहता है कि प्रेम के लिए उसके पास न तो समय होता है न ही ताकत। इससे भी बड़े विवाद बच्चों और अभिभावकों के बीच खड़े होते हैं। परिवार का मुखिया, जिस पर परिवार के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी भी होती है, काम के बोझ तले इतना दब जाता है कि अपने बच्चों को जान पाने का अवसर ही उसे नहीं मिल पाता। उनके बीच कोई खास संपर्क नहीं रह जाता-भले ही इसके बदले उनके पास सुविधा और ऐश-ओ-आराम की हर वस्तु उपलब्ध हो जाती है।

अगर आप अपने बच्चों के साथ ज़्यादा वक़्त गुजारना चाहते हैं तो आपको कुछ सुविधाओं और आराम की कुछ वस्तुओं के बगैर काम चलाना होगा। हमने ऐसा करने का निर्णय लिया है। अगर हम चाहते कि हम ज़्यादा रुपया कमाएं तो मुझे ज़्यादा सफर करना पड़ता, विदेश जाकर महीनों रहना पड़ता, वहाँ बहुत सी कार्यशालाएँ और सेमिनार आयोजित करने पड़ते। हम अभी जितना कमाते हैं, विदेशों में यह सब करके उससे कई गुना ज़्यादा कमा सकते थे, लेकिन हमने निर्णय किया कि अतिरिक्त रुपया कमाने की जगह हम अपनी बेटी के साथ ज़्यादा समय गुजारेंगे। हम अब भी काम करते हैं, और काफी मेहनत के साथ अपना काम करते हैं लेकिन हम स्वतंत्र हैं कि जब चाहें काम से अवकाश ले लें और अपनी बेटी अपरा के साथ खेलना शुरू कर दें। हमने एक बीच का रास्ता अपना लिया है।

इस चर्चा से यह निष्कर्ष निकलता है कि हर एक को अपने लिए ऐश-ओ-आराम की एक सीमा निर्धारित करनी पड़ती है और उसी के अनुपात में उस समय सीमा का भी निर्धारण करना पड़ता है जिसे वह अपने परिवार और बच्चों के साथ बिताना चाहता है। आप इसे किसी भी तरह से साधें, एक बात कभी न भूलें: अपने और परिवार के भोग-विलास को इतना ज़्यादा महत्व न दें कि प्रेम की अनदेखी हो जाए, उसका तिरस्कार हो जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बच्चों की अवहेलना या उनका तिरस्कार न हो। बच्चे आपका प्यार चाहते हैं, भले ही उनके पास एकाध खिलौना कम हो, भले ही छुट्टियाँ बिताने किसी हिल स्टेशन पर न जा पाएँ या महंगे कपड़े न खरीद पाएँ। उन्हें आपकी ज़रूरत है, न कि इन अतिरिक्त वस्तुओं या सुविधाओं की।